क्या आप जानते हैं कि भारतीय संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में अधिकतम कितने सदस्य हो सकते हैं? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार, भारत में लोकसभा सीटों की संख्या अधिकतम 550 हो सकती है। हालांकि, वर्तमान में भारत में लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 है।
104वें संविधान संशोधन अधिनियम 2019 से पहले लोकसभा में अधिकतम सीटों का यह आंकड़ा 552 हुआ करता था। लेकिन इस ऐतिहासिक संशोधन के द्वारा लोकसभा में ‘आंग्ल-भारतीय’ समुदाय के लिए आरक्षित 2 सीटों के प्रावधान को रद्द कर दिया गया, जिससे अब राष्ट्रपति द्वारा दो आंग्ल-भारतीयों का मनोनयन समाप्त हो गया है।परिसीमन विधेयक 2026 एवं 131वें संविधान संशोधन विधेयक की स्थिति सहित। प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, State PSC, SSC आदि) के नज़रिए से यह एक बेहद महत्वपूर्ण विषय है। आज की इस पोस्ट में हम निम्नलिखित बिंदुओं को विस्तार से समझेंगे:
- भारत में लोकसभा सदस्य संख्या से जुड़े संवैधानिक प्रावधान
- आंग्ल-भारतीयों का मनोनयन और 104वाँ संविधान संशोधन
- लोकसभा में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) आरक्षण
- राज्यों में लोकसभा सीटों का आवंटन और उसका आधार
- परिसीमन (Delimitation) क्या है और इस पर रोक की वर्तमान स्थिति
- परिसीमन विधेयक 2026 और 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक — नवीनतम घटनाक्रम

भारत में लोकसभा सीटों की संख्या से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान के भाग V (Part V) में संघ का वर्णन है, जिसके अंतर्गत कुल अनुच्छेद 52 से 151 तक आते हैं। इसी भाग के अंतर्गत ‘संसद’ से जुड़े प्रावधान (अनुच्छेद 79 से 122) दिए गए हैं। इनमें से अनुच्छेद 81 विशेष रूप से लोकसभा की संरचना को परिभाषित करता है, जिसके प्रावधान इस प्रकार हैं:
- अनुच्छेद 81 के अनुसार, लोकसभा में अधिकतम 550 सदस्य हो सकते हैं।
- इन 550 सदस्यों में से अधिकतम 530 सदस्य राज्यों से निर्वाचित होंगे और अधिकतम 20 सदस्य संघ शासित प्रदेशों से निर्वाचित होंगे।
- वर्तमान में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 है। वर्तमान में कोई भी मनोनीत सदस्य नहीं है — सभी 543 सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।
- इन 543 सदस्यों में से 524 सदस्य राज्यों से और 19 सदस्य संघ शासित प्रदेशों से निर्वाचित होते हैं।
इसे भी पढ़ें- भारत में राज्यसभा सीटों की संख्या (राज्यवार लिस्ट)
लोकसभा में आंग्ल-भारतीयों का मनोनयन और 104वाँ संविधान संशोधन
जब 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ, तो संविधान निर्माताओं ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय के लिए आरक्षण की विशेष व्यवस्था की थी। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर इन अनुच्छेदों से सीधे सवाल पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें एक साथ समझ लीजिए:
- अनुच्छेद 330: यह लोकसभा में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 331: यह लोकसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व की बात करता है। इसके अनुसार यदि राष्ट्रपति को लगे कि लोकसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, तो वे इस समुदाय के अधिकतम दो (2) सदस्यों को लोकसभा में मनोनीत कर सकते थे।
- अनुच्छेद 332: यह राज्यों की विधानसभाओं में SC और ST के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 333: यह राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीयों के मनोनयन की बात करता है (यहाँ राज्यपाल 1 सदस्य को मनोनीत कर सकता था)।
आरक्षण की समय-सीमा और 104वाँ संविधान संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 334 में यह तय किया गया था कि SC, ST और आंग्ल-भारतीयों को मिलने वाला यह राजनीतिक आरक्षण कितने समय तक लागू रहेगा। शुरुआत (1950) में इसे केवल 10 वर्षों के लिए, यानी 1960 तक लागू किया गया था। लेकिन जैसे ही 10 साल पूरे होने को आते, संसद संविधान में संशोधन करके इसे अगले 10 सालों के लिए बढ़ा देती थी। दशकों तक यही सिलसिला चलता रहा। लेकिन 25 जनवरी 2020 को जब इस आरक्षण की मियाद फिर से ख़त्म हो रही थी, तब संसद ने 104वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 पारित किया। इस संशोधन के तहत दो बड़े फ़ैसले लिए गए:
- SC/ST आरक्षण बढ़ाया गया: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC और ST के आरक्षण को अगले 10 वर्षों के लिए, यानी 25 जनवरी 2030 तक बढ़ा दिया गया।
- आंग्ल-भारतीयों का मनोनयन समाप्त: इस बार संसद ने आंग्ल-भारतीयों के मनोनयन की समय-सीमा को आगे नहीं बढ़ाया।
चूँकि इसे आगे नहीं बढ़ाया गया, इसलिए 104वें संविधान संशोधन के बाद से लोकसभा (अनुच्छेद 331) और राज्य विधानसभाओं (अनुच्छेद 333) में आंग्ल-भारतीयों का मनोनयन पूरी तरह समाप्त हो गया है।
राज्यों में लोकसभा सीटों का आवंटन
भारतीय संविधान के अनुसार, राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का बँटवारा उनके ‘क्षेत्रफल’ के बजाय उनकी ‘जनसंख्या’ के आधार पर किया गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81(2) में लोकसभा सीटों के आवंटन को लेकर दो बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि पूरे देश में प्रतिनिधित्व का स्तर बराबर रहे:
पहला प्रावधान — राज्यों के बीच समानता
राज्यों के मध्य लोकसभा सीटों का आवंटन इस प्रकार किया जाएगा कि किसी राज्य की जनसंख्या और उसे आवंटित लोकसभा सीटों की संख्या का अनुपात पूरे देश के सभी राज्यों के लिए एक समान रहे। सरल शब्दों में: देश के प्रत्येक नागरिक को लोकसभा में बराबर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि 2 करोड़ की आबादी वाले राज्य के पास 10 लोकसभा सीटें हैं, तो 4 करोड़ की आबादी वाले राज्य को उसी अनुपात में 20 सीटें मिलनी चाहिए।
दूसरा प्रावधान — राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की समानता
प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (Territorial Constituencies — जैसे वाराणसी, बाड़मेर, पटना साहिब आदि) में इस तरह विभाजित किया जाएगा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसको आवंटित सीटों की संख्या का अनुपात पूरे राज्य में यथासंभव एक जैसा हो। सरल शब्दों में: राज्य के भीतर हर सांसद लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करे। ऐसा न हो कि राज्य की एक लोकसभा सीट पर 10 लाख वोटर हों और दूसरी सीट पर 25 लाख। अब एक बड़ा सवाल उठता है: चूँकि जनसंख्या कोई स्थिर चीज़ नहीं है, वह समय के साथ लगातार बदलती रहती है, तो फिर अनुच्छेद 81(2) के ये दोनों नियम हमेशा कैसे लागू रह पाएंगे? दस साल बाद तो यह अनुपात बिगड़ जाएगा। इसी समस्या को सुलझाने के लिए संविधान में ‘परिसीमन’ (Delimitation) की विशेष व्यवस्था की गई है।
परिसीमन (Delimitation) — लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 में यह उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों का राज्यों के बीच आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण फिर से किया जाएगा। सरल शब्दों में — जिस राज्य की जनसंख्या बढ़ेगी उसकी लोकसभा सीटें बढ़ा दी जाएंगी, और जिस राज्य की जनसंख्या घटेगी उसकी सीटें कम कर दी जाएंगी। परिसीमन के संबंध में कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है और संसद इसके लिए एक ‘परिसीमन आयोग’ का गठन करती है।
परिसीमन पर रोक क्यों लगाई गई?
1971 की जनगणना तक सब कुछ सामान्य रूप से चलता रहा, लेकिन इसके बाद एक बड़ी व्यावहारिक समस्या सामने आई। भारत सरकार 1952 से ही देश में ‘जनसंख्या नियंत्रण’ के लिए गंभीर प्रयास कर रही थी। दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे केरल, तमिलनाडु) ने इन नीतियों को अच्छे से लागू किया और अपनी जनसंख्या नियंत्रित कर ली, जबकि उत्तर भारतीय राज्य (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) इसमें पिछड़ गए और वहाँ जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी। अब यदि हर 10 साल में जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता रहता, तो उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बहुत बढ़ जातीं और दक्षिण भारतीय राज्यों को जनसंख्या नियंत्रित करने का ‘इनाम’ उनकी सीटें कम करके मिलता। इससे देश का जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम विफल हो सकता था। इसी समस्या को सुलझाने के लिए संविधान (अनुच्छेद 81 और 82) में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन संशोधनों को समझने के लिए परिसीमन के दो मुख्य कार्यों को अलग-अलग समझना होगा:
(क) राज्यों के मध्य सीटों का आवंटन
इसके अंतर्गत यह तय किया जाता है कि किसी राज्य को कुल कितनी लोकसभा सीटें मिलेंगी (जैसे उत्तर प्रदेश को 80, राजस्थान को 25)।
- पहला कदम: दक्षिण भारतीय राज्यों के नुकसान को रोकने के लिए सबसे पहले 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा सीटों की संख्या को वर्ष 2000 के बाद की पहली जनगणना तक रोक दिया गया था।
- वर्तमान स्थिति: इसके बाद 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के द्वारा 1971 की जनगणना को ही आधार मानकर राज्यों की कुल लोकसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक फ्रीज़ कर दिया गया।
(ख) राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण
इसके अंतर्गत किसी लोकसभा सीट की भौगोलिक सीमाएँ तय की जाती हैं — यानी किस इलाके के वोटर किस लोकसभा सीट के लिए वोट करेंगे। इसमें राज्य की कुल सीटें नहीं बढ़तीं, बस राज्य के अंदर सीटों का नक्शा बदल दिया जाता है। वर्तमान स्थिति: 87वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा यह तय किया गया कि राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण 2001 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा।
- राज्यों की कुल लोकसभा सीटों की संख्या — 1971 की जनगणना के आधार पर तय (84वाँ संविधान संशोधन, 2001)।
- राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों का आकार/सीमा — 2001 की जनगणना के आधार पर तय (87वाँ संविधान संशोधन, 2003)।
अप्रैल 2026 में परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर देश की सबसे बड़ी संवैधानिक बहस बन गया। 16 से 18 अप्रैल 2026 तक बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में केंद्र सरकार ने तीन विधेयक प्रस्तुत किए:
- संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026
- परिसीमन विधेयक, 2026
- संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2026
इन विधेयकों में क्या प्रस्तावित था?
- लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करना — जिसमें अधिकतम 815 सदस्य राज्यों से और 35 सदस्य संघ शासित प्रदेशों से।
- अगला परिसीमन 1971 के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर कराना।
- 106वें संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) के तहत महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को जल्द लागू करना, क्योंकि उसका क्रियान्वयन परिसीमन पर ही निर्भर है।
इन विधेयकों का क्या हुआ?
यह मुद्दा विवादित क्यों रहा? दक्षिण भारतीय राज्यों की आशंका थी कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन होने से उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा। अनुमानों के अनुसार वर्तमान कुल संख्या बनी रहने की स्थिति में तमिलनाडु की सीटें 39 से घटकर 32 और केरल की 20 से घटकर 15 रह जातीं, जबकि उत्तर प्रदेश की 80 से बढ़कर 89, बिहार की 40 से बढ़कर 46 और राजस्थान की 25 से बढ़कर 30 हो जातीं। चूँकि यह विषय अभी सक्रिय राजनीतिक बहस का हिस्सा है, आगामी परीक्षाओं की तैयारी करते समय इसकी नवीनतम स्थिति अवश्य जाँच लें।
भारत में लोकसभा सीटों की संख्या की राज्यवार लिस्ट और महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत में सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटें उत्तर प्रदेश के पास हैं — 80 सीटें।
- दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र (48 सीटें) है।
- तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल (42 सीटें) और चौथे स्थान पर बिहार (40 सीटें) है।
- वर्तमान में लोकसभा में आरक्षित सीटों की संख्या 131 है — जिसमें 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं।
- उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 17 लोकसभा सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं।
- मध्य प्रदेश में सर्वाधिक 6 लोकसभा सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं।
- उत्तर प्रदेश में 17 सीटें SC के लिए आरक्षित हैं, लेकिन एक भी सीट ST के लिए आरक्षित नहीं है।
- क्षेत्रफल के अनुसार चार सबसे बड़े लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र: (1) लद्दाख (2) बाड़मेर (3) कच्छ (4) अरुणाचल पूर्व।
- क्षेत्रफल के अनुसार सबसे छोटा निर्वाचन क्षेत्र: चांदनी चौक (दिल्ली)।
- मतदाताओं के अनुसार सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र: मलकाजगिरी (तेलंगाना)।
- मतदाताओं के अनुसार सबसे छोटा निर्वाचन क्षेत्र: लक्षद्वीप।

भारत के राज्यों में लोकसभा सीटों की सूची (राज्यवार लिस्ट)
यहाँ भारत के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में आवंटित लोकसभा सीटों की पूरी सूची दी गई है। इसे सीटों की संख्या के घटते क्रम में रखा गया है, ताकि याद करने में आसानी हो:
| राज्य / केंद्र शासित प्रदेश (UT) | लोकसभा सीटों की संख्या |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 80 |
| महाराष्ट्र | 48 |
| पश्चिम बंगाल | 42 |
| बिहार | 40 |
| तमिलनाडु | 39 |
| मध्य प्रदेश | 29 |
| कर्नाटक | 28 |
| गुजरात | 26 |
| राजस्थान | 25 |
| आंध्र प्रदेश | 25 |
| ओडिशा | 21 |
| केरल | 20 |
| तेलंगाना | 17 |
| झारखंड | 14 |
| असम | 14 |
| पंजाब | 13 |
| छत्तीसगढ़ | 11 |
| हरियाणा | 10 |
| दिल्ली (UT) | 7 |
| जम्मू-कश्मीर (UT) | 5 |
| उत्तराखंड | 5 |
| हिमाचल प्रदेश | 4 |
| अरुणाचल प्रदेश | 2 |
| गोवा | 2 |
| मणिपुर | 2 |
| त्रिपुरा | 2 |
| मेघालय | 2 |
| दादरा एवं नगर हवेली और दमन व दीव (UT) | 2 |
| नागालैंड | 1 |
| सिक्किम | 1 |
| मिज़ोरम | 1 |
| अंडमान एवं निकोबार (UT) | 1 |
| चंडीगढ़ (UT) | 1 |
| लद्दाख (UT) | 1 |
| पुडुचेरी (UT) | 1 |
| लक्षद्वीप (UT) | 1 |
| राज्यों से कुल सीटें | 524 |
| केंद्र शासित प्रदेशों से | 19 |
| कुल लोकसभा सीटें | 543 |
निष्कर्ष — लोकसभा सीटें और परिसीमन
आसान शब्दों में कहें तो भारत में लोकसभा सीटों की व्यवस्था एक ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया है जो ‘जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व’ और देश के ‘राजनीतिक संतुलन’ दोनों को साधने का काम करती है। अप्रैल 2026 की संसदीय बहस ने दिखाया कि यह संतुलन आज भी कितना संवेदनशील विषय है।
एग्ज़ाम के लिए मास्टर ट्रिक — ये तीन नंबर याद रखें:
- 543: वर्तमान में लोकसभा की कुल निर्वाचित सीटें।
- 550: संविधान (अनुच्छेद 81) के तहत निर्धारित अधिकतम सीटें।
- 552: 104वें संविधान संशोधन (2019) से पहले की पुरानी अधिकतम सीमा।
क्विक रिवीजन
| महत्वपूर्ण विषय | एक लाइन में परीक्षा उपयोगी तथ्य |
|---|---|
| आंग्ल-भारतीय मनोनयन | 104वें संविधान संशोधन (2019) से पूर्णतः समाप्त |
| SC/ST आरक्षण | 104वें संशोधन द्वारा 25 जनवरी 2030 तक विस्तारित |
| सीट आवंटन का आधार | राज्यों की जनसंख्या (भौगोलिक क्षेत्रफल नहीं) |
| छोटे राज्यों को सुरक्षा | 60 लाख से कम आबादी वालों को न्यूनतम 1 सीट (31वाँ संशोधन, 1973) |
| परिसीमन आयोग (अब तक) | 4 बार गठित — 1952, 1963, 1973, 2002 |
| राज्यों की कुल सीटों पर रोक | 1971 की जनगणना पर आधारित, 2026 के बाद की पहली जनगणना तक (84वाँ संशोधन, 2001) |
| निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा पर रोक | 2001 की जनगणना पर आधारित (87वाँ संशोधन, 2003) |
| 131वाँ संशोधन विधेयक, 2026 | 850 सीटों का प्रस्ताव — 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पारित नहीं हो सका |
| महिला आरक्षण | 106वाँ संशोधन (2023) — क्रियान्वयन परिसीमन पर निर्भर |
लोकसभा सीटों से संबंधित परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न-उत्तर
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: भारत में लोकसभा सीटों की संख्या कितनी है?
उत्तर: वर्तमान में लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, जिनमें से 524 राज्यों से और 19 केंद्र शासित प्रदेशों से निर्वाचित होती हैं। संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार यह संख्या अधिकतम 550 तक हो सकती है।
प्रश्न 2: लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर 850 कब होंगी?
उत्तर: अप्रैल 2026 में सरकार ने संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक के ज़रिए अधिकतम सीमा 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा था, किंतु 17 अप्रैल 2026 को यह विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने से पारित नहीं हो सका और परिसीमन विधेयक भी वापस ले लिया गया। इसलिए फ़िलहाल अधिकतम सीमा 550 ही है।
प्रश्न 3: किस राज्य में सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटें हैं?
उत्तर: उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटें हैं। इसके बाद महाराष्ट्र (48), पश्चिम बंगाल (42), बिहार (40) और तमिलनाडु (39) का स्थान आता है।
प्रश्न 4: लोकसभा सीटों का आवंटन किस आधार पर होता है?
उत्तर: राज्यों की जनसंख्या के आधार पर, न कि उनके क्षेत्रफल के आधार पर। अनुच्छेद 81(2) के अनुसार प्रत्येक राज्य की जनसंख्या और उसकी सीटों का अनुपात पूरे देश में यथासंभव एक समान होना चाहिए। हालाँकि 60 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम से कम 1 सीट अवश्य दी जाती है।
प्रश्न 5: परिसीमन पर रोक कब तक है?
उत्तर: 84वें संविधान संशोधन 2001 के अनुसार यह रोक “वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक” लागू है। यानी केवल 2026 आ जाने भर से यह रोक स्वतः समाप्त नहीं होती।
प्रश्न 6: लोकसभा में कितनी सीटें आरक्षित हैं?
उत्तर: कुल 131 सीटें आरक्षित हैं — 84 अनुसूचित जाति (SC) के लिए और 47 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए। 104वें संविधान संशोधन द्वारा यह आरक्षण 25 जनवरी 2030 तक बढ़ाया गया है।
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