उत्तर प्रदेश जितना अपनी नदियों और इतिहास के लिए जाना जाता है, उतना ही यहाँ की वन्यजीव संपदा भी समृद्ध है। उत्तर में हिमालय की तलहटी के घने साल वनों से लेकर दक्षिण में विंध्य और बुंदेलखंड के पथरीले पठारों तक — राज्य में दो बिल्कुल अलग तरह के जंगल-संसार बसते हैं। UPPSC, RO-ARO और UPSSSC जैसी परीक्षाओं में इस टॉपिक से लगभग हर साल कोई न कोई सवाल जरूर आता है, और सच कहूं तो ज़्यादातर छात्र यहाँ सिर्फ इसलिए अंक गंवाते हैं क्योंकि वे नाम और जिला तो रट लेते हैं पर नदी, वन्यजीव और स्थापना वर्ष को आपस में गड्डमड्ड कर देते हैं। इस लेख में मैंने कोशिश की है कि हर अभयारण्य को मानचित्र और उसके भूगोल के साथ जोड़कर समझाऊं, ताकि याद रखना आसान हो।
आगे इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश के एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान (दुधवा), 4 प्रमुख Tiger Reserves in UP और 10+ महत्वपूर्ण वन्यजीव अभयारण्यों का परीक्षा-उपयोगी विश्लेषण करेंगे। चीजों को विज़ुअलाइज़ करने और आसानी से याद रखने के लिए हमने एक विशेष UP Wildlife Map भी तैयार किया है, जिसे सामने रखकर पढ़ने से यह पूरा भूगोल दिमाग में एक तस्वीर की तरह बैठ जायेगा।
उत्तर प्रदेश में वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों का भौगोलिक वितरण (UP Wildlife Map)

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उत्तर प्रदेश के मानचित्र का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि राज्य के प्रमुख संरक्षित क्षेत्र पूरे राज्य में समान रूप से नहीं फैले हैं। मध्य उत्तर प्रदेश का विशाल गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ और कृषि प्रधान होने के कारण घने जंगलों से विहीन है।
परिणामस्वरूप, उत्तर प्रदेश की लगभग संपूर्ण वन्यजीव विविधता और बड़े संरक्षित क्षेत्र मुख्य रूप से राज्य के दो विपरीत भौगोलिक छोरों—उत्तरी तराई क्षेत्र और दक्षिणी पठारी/पर्वतीय क्षेत्र—में ही सिमटे हुए हैं। इन दोनों क्षेत्रों की जलवायु, वनस्पतियों और वन्यजीवों में दिन-रात का अंतर है:
1. उत्तरी तराई-भाबर क्षेत्र
यह उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध और सघन वन क्षेत्र है, जो हिमालय की तलहटी (शिवालिक के दक्षिण) में सहारनपुर से लेकर पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच होते हुए महराजगंज तक (नेपाल सीमा के समानांतर) फैला हुआ है।
- भौगोलिक विशेषताएं: हिमालय से तेजी से उतरने वाली नदियाँ जब इस समतल क्षेत्र में आती हैं, तो वे अपने साथ लाई गई मिट्टी और जल से एक नमी युक्त, दलदली भू-भाग का निर्माण करती हैं। यहाँ पानी की कोई कमी नहीं होती।
- वनस्पतियां: यहाँ उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन पाए जाते हैं। यह क्षेत्र अपने अत्यंत ऊंचे ‘साल’ के वृक्षों और ‘हाथी घास’ वाले विशाल घास के मैदानों (जिन्हें फांटा कहा जाता है) के लिए विश्व विख्यात है।
- प्रमुख वन्यजीव: अधिक नमी और घनी घास के कारण यह क्षेत्र ‘मेगा फौना’ (विशालकाय जीवों) के लिए सबसे अनुकूल है। यहाँ मुख्य रूप से बाघ, हाथी, गैंडा और बारहसिंगा निवास करते हैं।
- इस क्षेत्र के प्रमुख संरक्षित वन: दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, अमनगढ़ टाइगर रिजर्व, कतरनियाघाट, किशनपुर, सुहेलवा और सोहागीबरवा वन्यजीव अभयारण्य इसी इकोलॉजिकल बेल्ट (तराई आर्क लैंडस्केप) का हिस्सा हैं।
2. दक्षिणी विंध्य एवं बुंदेलखंड का पठारी क्षेत्र
यह उत्तर प्रदेश का दक्षिणी हिस्सा है जो मध्य प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है। इसके अंतर्गत ललितपुर, झाँसी, बांदा, चित्रकूट, मिर्जापुर और सोनभद्र जैसे जिले आते हैं। यह भारत के प्राचीनतम प्रायद्वीपीय पठार का हिस्सा है।
- भौगोलिक विशेषताएं: तराई के विपरीत, यहाँ की जमीन पथरीली, चट्टानी और ऊबड़-खाबड़ है (जैसे- विंध्य की सीढ़ीदार चट्टानें या चंबल के बीहड़)। यहाँ नदियाँ गहरी खाइयों से होकर बहती हैं और जलवायु अपेक्षाकृत बहुत शुष्क होती है।
- वनस्पतियां: चट्टानी मिट्टी और कम वर्षा के कारण यहाँ उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन और कटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। यहाँ साल के बजाय मुख्य रूप से सागौन (Teak), तेंदू, महुआ, पलाश, खैर और बबूल के पेड़ उगते हैं।
- प्रमुख वन्यजीव: यह शुष्क और चट्टानी वातावरण बड़े स्तनधारियों (जैसे गैंडे या हाथी) के अनुकूल नहीं है। इसके बजाय, यहाँ तेंदुआ, भालू , चिंकारा, काला हिरण (, चौसिंगा और चट्टानों पर घोंसला बनाने वाले गिद्ध बहुतायत में पाए जाते हैं।
- इस क्षेत्र के प्रमुख संरक्षित वन: रानीपुर टाइगर रिजर्व (चित्रकूट), कैमूर अभयारण्य (मिर्जापुर/सोनभद्र), चंद्रप्रभा अभयारण्य (चंदौली), महावीर स्वामी अभयारण्य (ललितपुर) और राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (आगरा/इटावा) इसी शुष्क भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
📌 परीक्षा दृष्टि विशेष नोट
मध्य उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में बड़े जंगलों का अभाव है, लेकिन नदियों द्वारा छोड़ी गई गोखुर झीलों और दलदली आर्द्रभूमियों के कारण मध्य यूपी में ‘पक्षी विहारों’ और ‘हस्तिनापुर’ जैसे मैदानी वन्यजीव अभयारण्य का एक सघन नेटवर्क पाया जाता है।
उत्तर प्रदेश के वन्यजीव क्षेत्रों का भौगोलिक वितरण (तुलनात्मक तालिका)
| तुलना का आधार | उत्तरी तराई-भाबर क्षेत्र | दक्षिणी विंध्य एवं बुंदेलखंड क्षेत्र |
| भौगोलिक विस्तार | सहारनपुर से महराजगंज तक (नेपाल सीमा के समानांतर)। | मध्य प्रदेश सीमा से लगे दक्षिणी जिले (ललितपुर, चित्रकूट, मिर्जापुर, सोनभद्र आदि)। |
| स्थलाकृति व जलवायु | समतल, नमी युक्त, दलदली और प्रचुर जल वाला क्षेत्र। | पथरीली, चट्टानी, ऊबड़-खाबड़ (बीहड़) और अपेक्षाकृत शुष्क जलवायु। |
| वन का प्रकार | उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन। | उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन और कटीली झाड़ियाँ। |
| प्रमुख वनस्पतियाँ | ऊंचे ‘साल’ (Sal) के वृक्ष और ‘हाथी घास’ के विशाल मैदान। | सागौन (Teak), तेंदू, महुआ, पलाश, खैर और बबूल। |
| प्रमुख वन्यजीव | बाघ, हाथी, गैंडा और बारहसिंगा जैसे विशालकाय जीव। | तेंदुआ, भालू (Sloth Bear), चिंकारा, काला हिरण, चौसिंगा और गिद्ध। |
| प्रमुख संरक्षित क्षेत्र | दुधवा, पीलीभीत, अमनगढ़, कतरनियाघाट, किशनपुर, सुहेलवा और सोहागीबरवा। | रानीपुर, कैमूर, चंद्रप्रभा, महावीर स्वामी और राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य। |
1. दुधवा राष्ट्रीय उद्यान (Dudhwa National Park) — उत्तर प्रदेश का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान
स्थिति और भौगोलिक जानकारी
- स्थान: लखीमपुर खीरी जिला, उत्तर प्रदेश (भारत-नेपाल सीमा के करीब), हिमालय की तलहटी (शिवालिक पर्वतमाला के दक्षिण) में स्थित है।
- क्षेत्रफल: उद्यान का कोर एरिया लगभग 490 वर्ग किलोमीटर में फैला है, और इसके आसपास बफर जोन भी है।
- परिदृश्य (Landscape): यह हिमालय की तलहटी में ‘तराई भाबर’ ईकोसिस्टम का हिस्सा है, जो अपने घने साल (Sal) के वनों, विशाल घास के मैदानों (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘फांटा’ कहा जाता है) और दलदली इलाकों के लिए जाना जाता है।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की नदियाँ और जल-तंत्र
दुधवा के तराई क्षेत्र की नमी और पारिस्थितिकी मुख्य रूप से सुहेली और मोहना नदियों पर निर्भर है:
- उत्तरी सीमा: मोहना नदी उद्यान के उत्तर से होकर बहती है और यह दुधवा की प्राकृतिक उत्तरी सीमा का निर्धारण करती है। (विशेष तथ्य: यह नदी भारत और नेपाल के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा का भी निर्माण करती है)।
- दक्षिणी सीमा: सुहेली नदी इस उद्यान के दक्षिण से होकर गुजरती है और इसकी प्राकृतिक दक्षिणी सीमा बनाती है।
- अपवाह तंत्र: ये दोनों नदियाँ आगे चलकर विशाल घाघरा (कौरीयाला) नदी तंत्र में मिल जाती हैं।
- महत्व: इन्हीं नदियों के कारण यहाँ वर्ष भर पर्याप्त नमी रहती है, जो बाघ, बारहसिंघा और गैंडों के प्राकृतिक आवास के लिए अत्यंत अनुकूल है।

इतिहास का सफर: अभयारण्य से टाइगर रिजर्व तक
दुधवा का इतिहास बहुत रोचक है। इसके संरक्षण का सबसे बड़ा श्रेय प्रसिद्ध प्रकृतिवादी और लेखक बिली अर्जन सिंह को जाता है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस जंगल और यहाँ के वन्यजीवों को बचाने में लगा दिया।
- वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना (1958): शुरुआत में इस क्षेत्र को मुख्य रूप से दलदली हिरणों यानी ‘बारहसिंगा’ (Swamp Deer) की तेजी से घटती आबादी को बचाने के लिए एक वन्यजीव अभयारण्य (सोनारीपुर अभयारण्य) के रूप में स्थापित किया गया था।
- राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा (जनवरी 1977): बिली अर्जन सिंह के अथक प्रयासों और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के बाद, इसे अपग्रेड करके ‘दुधवा राष्ट्रीय उद्यान’ का दर्जा दिया गया।
- गैंडा पुनर्वास परियोजना (1984): 1878 में शिकार के कारण दुधवा से गैंडे विलुप्त हो गए थे। 1984 में असम के पोबितोरा और काजीरंगा अभयारण्य से गैंडों को लाकर दुधवा के दक्षिण ककरी क्षेत्र में (27 वर्ग किमी के बाड़े में) बसाया गया। आनुवंशिक विविधता को बेहतर बनाने के लिए नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से भी 4 गैंडे यहाँ लाए गए। गैंडे लंबी घास खाते हैं, जिससे छोटे हिरणों (पाढ़ा, काकड़) के लिए नई कोमल घास उग पाती है।
- टाइगर रिजर्व की घोषणा (1987-1988): भारत में बाघों के संरक्षण के लिए शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (1973) के तहत, 1987-88 में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और इसके पास स्थित किशनपुर अभयारण्य को मिलाकर ‘दुधवा टाइगर रिजर्व’ की स्थापना की गई। बाद में वर्ष 2000 में कतरनियाघाट अभयारण्य को भी इसका हिस्सा बना दिया गया।
प्रमुख वन्यजीव और वनस्पतियां
दुधवा उन चुनिंदा जगहों में से है जहाँ आप एक ही जंगल में ‘बिग फोर’ (बाघ, गैंडा, हाथी और बारहसिंगा) को एक साथ देख सकते हैं।
- प्रमुख वन्यजीव :
- बारहसिंगा: दुनिया की लगभग आधी आबादी यहीं पाई जाती है। (नोट: यह उत्तर प्रदेश का राजकीय पशु भी है)।
- बंगाल टाइगर: यहाँ की घनी सवाना घास बाघों के छिपने के लिए एक आदर्श प्राकृतिक आवास है।
- भारतीय गैंडा: 1984 की सफल पुनर्वास परियोजना के बाद से यहाँ इनकी एक स्वस्थ आबादी पनप रही है।
- हिस्पिड हेयर: यह एक अत्यंत दुर्लभ प्रजाति का खरगोश है, जिसे 1984 में दुधवा में ही फिर से खोजा गया था।
- एशियाई हाथी: नेपाल के जंगलों से हाथियों का झुंड यहाँ आता है, और अब कई हाथियों ने इसे अपना स्थायी घर बना लिया है।
- अन्य प्रमुख जीव: तेंदुआ, स्लॉथ बीयर (भालू), फिशिंग कैट (मछली मार बिल्ली) और पाढ़ा (Hog Deer)।
- पक्षी प्रजातियां:
दुधवा पक्षी प्रेमियों के लिए एक स्वर्ग है। यहाँ पक्षियों की 400 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- दुर्लभ पक्षी: यहाँ विश्व स्तर पर संकटग्रस्त ‘बंगाल फ्लोरिकन’ और ‘स्वैम्प फ्रैंकोलिन’ पाए जाते हैं।
- अन्य प्रजातियां: ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल, उल्लू की विभिन्न प्रजातियाँ और सर्दियों में आने वाले हजारों प्रवासी पक्षी।
- प्रमुख वनस्पतिया:
- उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन: दुधवा का जंगल मुख्य रूप से ‘उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन’ श्रेणी में आता है।
- साल के वन: दुधवा विश्व स्तर पर अपने अत्यंत घने और ऊंचे ‘साल’ के वृक्षों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का सबसे प्रमुख पेड़ साल ही है।
- घास के मैदान: जंगल के बीच-बीच में विशाल घास के मैदान हैं जिन्हें ‘फांटा’ कहा जाता है। यहाँ ‘एलीफेंट ग्रास’ (हाथी घास) पाई जाती है जो कई फीट तक ऊँची होती है।
- अन्य वृक्ष: साल के अलावा यहाँ शीशम, जामुन, गूलर, सेमल और खैर के पेड़ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

2. उत्तर प्रदेश के टाइगर रिजर्व (Tiger Reserves in UP)
प्रोजेक्ट टाइगर (1973) के तहत बाघों के संरक्षण के लिए वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कुल 4 टाइगर रिजर्व हैं। परीक्षाओं में इनकी स्थापना का वर्ष, संबंधित जिले और विशिष्ट भौगोलिक विशेषताएं कूट (Match the following) के रूप में पूछी जाती हैं।
I. दुधवा टाइगर रिजर्व
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र को और अधिक विस्तार देते हुए, 1987-88 में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और इसके पास स्थित किशनपुर अभयारण्य को मिलाकर ‘दुधवा टाइगर रिजर्व’ का दर्जा दिया गया। बाद में वर्ष 2000 में कतरनियाघाट अभयारण्य को भी इसका हिस्सा बना दिया गया।
- स्थापना वर्ष: 1987-1988 (यह उत्तर प्रदेश का पहला और सबसे पुराना टाइगर रिजर्व है)।
- संरचना: इसमें तीन क्षेत्र शामिल हैं – दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य, और कतरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्य।

(नोट: दुधवा टाइगर रिजर्व के हिस्से—कतरनियाघाट और किशनपुर अभयारण्य—का अत्यंत विस्तृत विवरण नीचे ‘वन्यजीव अभयारण्य’ के अनुभाग में दिया गया है।)
II. अमनगढ़ टाइगर रिजर्व
यह उत्तर प्रदेश का एक बहुत ही अनूठा टाइगर रिजर्व है क्योंकि इसका इतिहास उत्तराखंड से जुड़ा हुआ है।
- जिला: बिजनौर
- स्थापना वर्ष: 2012 (उत्तर प्रदेश का दूसरा टाइगर रिजर्व घोषित)।
- भौगोलिक विशिष्टता और परीक्षा का प्रश्न: परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि “उत्तर प्रदेश का कौन सा टाइगर रिजर्व जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का बफर जोन है?”
- व्याख्या: अमनगढ़ मूल रूप से जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का ही हिस्सा था। लेकिन जब 2000 में उत्तर प्रदेश का विभाजन होकर उत्तराखंड बना, तो कॉर्बेट नेशनल पार्क उत्तराखंड में चला गया और उसका जो बफर क्षेत्र उत्तर प्रदेश (बिजनौर) में रह गया, उसे ‘अमनगढ़ टाइगर रिजर्व’ नाम दिया गया।
- मुख्य वन्यजीव: बाघों के अलावा यह एशियाई हाथियों के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ बाघ कॉर्बेट से ही भ्रमण करते हुए आते हैं।
III. पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR)
पीलीभीत टाइगर रिजर्व अपने घने साल के जंगलों, दलदली भूमियों और बाघों के संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है। यह भारत-नेपाल सीमा पर ‘तराई आर्क लैंडस्केप’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- जिला: पीलीभीत और शाहजहांपुर (मुख्य भाग पीलीभीत में है)। यह भी नेपाल सीमा से लगा हुआ तराई क्षेत्र है।
- स्थापना वर्ष: 2014 (उत्तर प्रदेश का तीसरा टाइगर रिजर्व)।
- नदियां: यह रिजर्व शारदा और गोमती नदियों का प्रमुख जलग्रहण क्षेत्र है। शारदा नदी इसके उत्तर में बहती है। गोमती नदी का उद्गम स्थल (फुल्हर झील / गोमत ताल) पीलीभीत में ही इस रिजर्व के पास स्थित है।
- TX2 अवार्ड (TX2 Award 2020): पीलीभीत टाइगर रिजर्व को वर्ष 2020 में बाघों की आबादी को दोगुना करने के लिए प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय ‘TX2 अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था। इस रिजर्व ने 10 साल के लक्ष्य से बहुत पहले, मात्र 4 साल (2014 से 2018) में बाघों की संख्या को 25 से बढ़ाकर 65 कर दिया था।
- चूका बीच: शारदा सागर डैम के किनारे स्थित ‘चूका इको-टूरिज्म सेंटर’ (जिसे चूका बीच भी कहा जाता है) इसी टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है। यह एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है जहाँ घने जंगल के बीच पानी का विशाल किनारा समुद्र तट (Beach) जैसा अहसास देता है।
IV. रानीपुर टाइगर रिजर्व
यह उत्तर प्रदेश का सबसे नवीनतम टाइगर रिजर्व है और वर्तमान में (2022 के बाद से) परीक्षाओं का सबसे चहेता विषय है।
- जिला: चित्रकूट
- स्थापना वर्ष: 1977 में इसे रानीपुर वन्यजीव अभयारण्य बनाया गया था, लेकिन अक्टूबर 2022 में इसे उत्तर प्रदेश का चौथा और भारत का 53वां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया।
- भौगोलिक क्षेत्र : रानीपुर टाइगर रिजर्व अपनी भौगोलिक संरचना के मामले में दुधवा और पीलीभीत से बिल्कुल अलग है। जहाँ दुधवा तराई क्षेत्र में है, वहीं रानीपुर चट्टानी और पथरीले बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है। यहाँ की वनस्पतियां ‘शुष्क पर्णपाती’ प्रकार की हैं (जैसे- तेंदू, पलाश, खैर, महुआ)। यह रिजर्व विंध्य पर्वत श्रृंखला के उत्तरी हिस्से में फैला हुआ है।
📌 परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न:
- बुंदेलखंड का पहला Tiger Reserve कौन सा है? → रानीपुर
- UP का सबसे नया Tiger Reserve कौन सा है? → रानीपुर (2022)
- भारत का 53वाँ Tiger Reserve कौन सा है? → रानीपुर
- बाघों की स्थिति: घोषणा के समय रानीपुर में अपना कोई स्थायी निवासी बाघ नहीं था। हालाँकि, यह मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व के बहुत करीब (महज 150 किमी दूर) है और पन्ना के बाघ अक्सर शिकार की तलाश में कॉरिडोर के माध्यम से रानीपुर आते-जाते रहते हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण पन्ना का कुछ हिस्सा डूब क्षेत्र में आ रहा है, जिसके चलते बाघों के विस्थापन के लिए रानीपुर को टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित किया गया है।
- अन्य वन्यजीव: बाघों के अलावा यहाँ तेंदुआ, भालू (Sloth bear), नीलगाय, और विशेष रूप से चिंकारा और काला हिरण बहुतायत में पाए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के टाइगर रिजर्व एक नजर में
| टाइगर रिजर्व | संबंधित जिला | स्थापना (TR के रूप में) | विशेष तथ्य (नदी/पुरस्कार/सीमा) |
| दुधवा TR | लखीमपुर खीरी / बहराइच | 1987-88 | यूपी का सबसे पुराना, सुहेली नदी, नेपाल सीमा |
| अमनगढ़ TR | बिजनौर | 2012 | जिम कॉर्बेट का बफर जोन |
| पीलीभीत TR | पीलीभीत / शाहजहांपुर | 2014 | TX2 अवार्ड विजेता, शारदा नदी, चूका बीच |
| रानीपुर TR | चित्रकूट | 2022 | यूपी का सबसे नया, बुंदेलखंड का पहला TR, पन्ना टाइगर रिजर्व |
3. उत्तर प्रदेश के वन्यजीव अभयारण्य
1. चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य (1957)
- भौगोलिक स्थिति और जिला: यह चंदौली जिले में स्थित है। (नोट: कई बार पुराने विकल्पों में वाराणसी दिया रहता है क्योंकि चंदौली पहले वाराणसी का ही हिस्सा था, लेकिन वर्तमान में यह चंदौली में है)। वाराणसी शहर से इसकी दूरी मात्र 70 किलोमीटर है।
- स्थापना वर्ष: 1957 (यह उत्तर प्रदेश का प्रथम वन्यजीव अभयारण्य है)।
- कुल क्षेत्रफल: यह अपेक्षाकृत एक छोटा अभयारण्य है, जो लगभग 78 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
- भौगोलिक विस्तार (पहाड़ियाँ): यह अभयारण्य विंध्य पर्वत श्रृंखला के नौगढ़ और विजयगढ़ पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित है।
- नदी और जलप्रपात: परीक्षा में सीधा प्रश्न आता है कि “राजदरी और देवदरी जलप्रपात किस अभयारण्य में स्थित हैं?” उत्तर है – चंद्रप्रभा अभयारण्य। ये जलप्रपात विंध्य की सीढ़ीदार चट्टानों से गिरते हैं। यह चंद्रप्रभा नदी (जो आगे चलकर कर्मनाशा नदी में मिल जाती है) के बेसिन में स्थित है। इसी नदी पर चंद्रप्रभा डैम भी बना हुआ है।
- एशियाई शेरों का प्रयोग: 1958 में यहाँ गुजरात के गिर जंगलों से एशियाई शेरों को लाकर बसाने का ऐतिहासिक प्रयोग किया गया था। शुरुआत में उनकी संख्या बढ़ी, लेकिन बाद में अवैध शिकार और अन्य कारणों से 1970 के दशक तक वे यहाँ से पूरी तरह विलुप्त हो गए।
- वनस्पतियां: विंध्य क्षेत्र होने के कारण यहाँ उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। यहाँ के प्रमुख वृक्षों में तेंदू (जिसके पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है), महुआ, सागौन (Teak), पलाश, अमलतास और बेर शामिल हैं।
- प्रमुख वन्यजीव: शेरों के समाप्त होने के बाद, वर्तमान में यह मुख्य रूप से चिंकारा, काला हिरण, तेंदुआ, नीलगाय और जंगली सूअरों के लिए जाना जाता है।
- ऐतिहासिक महत्व: विंध्य पर्वत की गुफाओं की निकटता के कारण इस जंगल के आसपास के क्षेत्रों में कई प्रागैतिहासिक गुफा चित्र भी पाए गए हैं।
2. किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य (1972) – (दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा)
- स्थापना एवं विस्तार: लगभग 227 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला यह अभयारण्य सन् 1972 में स्थापित किया गया था। यह लखीमपुर खीरी जिले में स्थित है, जिसका कुछ भाग शाहजहाँपुर जिले की सीमा तक विस्तृत है। वर्ष 1987 में इसे दुधवा टाइगर रिजर्व के अंतर्गत सम्मिलित किया गया।
- नदियाँ: इसकी उत्तरी सीमा के साथ शारदा नदी प्रवाहित होती है, जिसे घाघरा की सहायक नदी के रूप में भी जाना जाता है। यही शारदा नदी किशनपुर अभयारण्य को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान से पृथक करती है।
- झादी ताल (प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग): किशनपुर अभयारण्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध विशेषता यहाँ स्थित ‘झादी ताल’ नामक झील है। प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु में यह झील हजारों प्रवासी पक्षियों का आश्रय स्थल बन जाती है। साइबेरिया, मध्य एशिया और हिमालय के पार से आने वाले पक्षी — जैसे बार-हेडेड गूज, रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड, कॉमन टील, पिनटेल डक और अनेक प्रकार के बगुले — इस झील पर डेरा डालते हैं।
- वन्यजीव एवं जैव-विविधता: यह बारहसिंगा के संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र है। इसके अतिरिक्त यहाँ बाघ, तेंदुआ, हाथी, चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर और अजगर भी पाए जाते हैं।
- पक्षी: सारस क्रेन — जो विश्व का सबसे ऊँचा उड़ने वाला पक्षी है और उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी भी है — यहाँ नियमित रूप से देखा जाता है। इसके साथ ही मोर, किंगफिशर, ब्राह्मणी डक और अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ भी यहाँ पाई जाती हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र: किशनपुर में साल वन, मिश्रित पर्णपाती वन, घास के मैदान और नम भूमि एक साथ विद्यमान हैं। झादी ताल के कारण यहाँ का आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र विशेष रूप से विकसित है।
3. कतरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्य (1975) – (दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा)
- स्थापना एवं विस्तार: सन् 1975 में स्थापित यह अभयारण्य लगभग 551 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह बहराइच जिले में नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटा हुआ है। वर्ष 1987 में इसे दुधवा टाइगर रिजर्व के अंतर्गत सम्मिलित किया गया।
- भौगोलिक स्थिति एवं नदियाँ: इस अभयारण्य की उत्तरी और पश्चिमी सीमा विश्व-प्रसिद्ध घाघरा नदी (सरयू) बनाती है, जो इसे दुधवा राष्ट्रीय उद्यान से भी पृथक करती है। अभयारण्य के भीतर से गिरवा नदी प्रवाहित होती है। इसके अतिरिक्त मोहाना नदी भी इस क्षेत्र के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को समृद्ध बनाती है।
- विशिष्ट वन्यजीव (जलीय जीव): कतरनियाघाट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गिरवा नदी विश्व में घड़ियालों और गंगा डॉल्फिन के सफल प्राकृतिक प्रजनन के लिए विश्व प्रसिद्ध है। घड़ियाल IUCN की ‘Critically Endangered’ श्रेणी में आता है, जबकि गंगा डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है। इसके अतिरिक्त यहाँ बाघ, एक सींग वाला भारतीय गैंडा, हाथी, तेंदुआ, सांभर, बारहसिंगा, चीतल और मगरमच्छ भी पाए जाते हैं।
- पक्षी: पक्षी-विविधता की दृष्टि से इसे Important Bird Area (IBA) का दर्जा प्राप्त है, जहाँ 250 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ देखी जाती हैं।
- खाता कॉरिडोर: इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है इसका नेपाल के बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ाव। दोनों देशों के बीच ‘खाता कॉरिडोर’ नामक एक महत्वपूर्ण ट्रांस-बाउंड्री वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है। यह बाघों और हाथियों को भारत-नेपाल के बीच स्वतंत्र आवागमन का मार्ग देता है, जिससे जीन विविधता बनी रहती है और अंतःप्रजनन से बचाव होता है।
- संरक्षण परियोजनाएँ: यहाँ प्रोजेक्ट टाइगर , Project Rhino और ‘घड़ियाल पुनर्वास कार्यक्रम’ के तहत सफल संरक्षण कार्य किए गए हैं।
4. महावीर स्वामी वन्यजीव अभयारण्य (1977)
- क्षेत्रफल और स्थापना (सबसे महत्वपूर्ण तथ्य): यह पूरे उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा वन्यजीव अभयारण्य है। इसका कुल क्षेत्रफल मात्र 5.4 वर्ग किलोमीटर है। इसकी स्थापना वर्ष 1977 में की गई थी और भगवान महावीर के नाम पर इसका नामकरण किया गया है।
- भौगोलिक स्थिति और जिला: यह ललितपुर जिले में स्थित है। ललितपुर वह विशिष्ट जिला है जो तीन ओर से मध्य प्रदेश की सीमा से घिरा हुआ है। यह बुंदेलखंड पठारी क्षेत्र का हिस्सा है।
- नदियां और पारिस्थितिकी: यह अभयारण्य प्रसिद्ध बेतवा नदी (बुंदेलखंड की जीवन रेखा) के किनारे/कैचमेंट क्षेत्र में स्थित है। बुंदेलखंड की शुष्क जलवायु के कारण यहाँ शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। इनमें सागौन, तेंदू, महुआ, खैर, पलाश और बबूल के पेड़ प्रमुखता से मिलते हैं।
- प्रमुख वन्यजीव: यह क्षेत्र विशेष रूप से गिद्धों की घटती आबादी को प्राकृतिक रूप से संरक्षित करने के लिए जाना जाता है। चट्टानी क्षेत्र गिद्धों के घोंसले बनाने के लिए अनुकूल हैं। छोटे आकार के बावजूद, यहाँ तेंदुआ, नीलगाय, जंगली सूअर, भालू और बंदर अच्छी खासी संख्या में देखे जाते हैं।
5. राष्ट्रीय चंबल वन्यजीव अभयारण्य (1979)
- भौगोलिक स्थिति और विस्तार: यूपी में यह अभयारण्य मुख्य रूप से आगरा और इटावा जिलों के अंतर्गत आता है। इसकी स्थापना 1979 में हुई।
- त्रि-राज्यीय सीमा: यह भारत का एक अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ अभयारण्य है, जो एक साथ तीन राज्यों—उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान—की सीमाओं पर विस्तृत है।
- नदियां और भौगोलिक विशेषताएं: यह चंबल नदी के लगभग 400 किलोमीटर लंबे जलीय क्षेत्र और रेतीले किनारों पर आधारित है। यह क्षेत्र चंबल के प्रसिद्ध ‘बीहड़ों’ के लिए जाना जाता है। नदी के तेज बहाव के कारण यहाँ ‘अवनालिका अपरदन’ होता है, जिससे गहरी खाइयां बन गई हैं।
- विशिष्ट वन्यजीव संरक्षण: यह अभयारण्य दुर्लभ जलीय प्रजातियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- घड़ियाल: यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी प्राकृतिक घड़ियाल आबादी पाई जाती है (घड़ियाल की थूथन लंबी/पतली होती है, यह केवल मछली खाता है)।
- गंगा डॉल्फिन: साफ पानी के कारण भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव ‘गंगा डॉल्फिन’ (सोंस या सूंस) यहाँ पाया जाता है।
- कछुए और पक्षी: ताजे पानी के कछुओं में ‘लाल मुकुट वाला कछुआ’ और सर्दियों में ‘इंडियन स्किमर’ पक्षी बहुतायत में देखा जाता है।
- समसामयिक घटना चुनौतियां: अवैध रेत खनन के कारण घड़ियाल और कछुओं के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। NGT और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर इस पूरे क्षेत्र को कड़ाई से ‘इको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) घोषित किया गया है।
6. कैमूर वन्यजीव अभयारण्य (1982)
- भौगोलिक स्थिति और जिला: यह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों में एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। यह पूर्व में बिहार की सीमा और दक्षिण में मध्य प्रदेश की सीमा के करीब स्थित है।
- स्थापना और क्षेत्रफल: स्थापना 1982; यह लगभग 501 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है।
- भौगोलिक विशेषताएं: यह विंध्य पर्वतमाला की कैमूर पर्वत श्रृंखलाओं पर स्थित है। यहाँ की स्थलाकृति ऊबड़-खाबड़, चट्टानी और गहरी घाटियों वाली है।
- ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व: यह क्षेत्र अपने प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ लखनिया दरी और अन्य गुफाओं में पाषाण काल के शिकार और जनजीवन के चित्र मिलते हैं।
- नदियां और जलप्रपात: यह सोन नदी घाटी के जल-ग्रहण क्षेत्र का हिस्सा है। मिर्जापुर का प्रसिद्ध मुक्खा जलप्रपात इसी के अंतर्गत आता है। बेलन नदी की घाटी भी इसी भू-भाग से जुड़ी है।
- वनस्पतियां: यहाँ उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। प्रमुख वृक्षों में सागौन, खैर, महुआ, पलाश (टेसू), सालई और तेंदू शामिल हैं। यहाँ बांस के घने जंगल भी बहुतायत में मिलते हैं।
- विशिष्ट वन्यजीव: यहाँ मुख्य रूप से काले हिरण, चिंकारा, चौसिंगा (Four-horned Antelope – जिसे भेंड़ भी कहा जाता है), भालू और तेंदुए पाए जाते हैं। चट्टानी पहाड़ होने के कारण यह गिद्धों और चील के लिए भी सुरक्षित आश्रय स्थल है।
7. हस्तिनापुर वन्यजीव अभयारण्य (1986)
- क्षेत्रफल और स्थापना: यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राज्य का सबसे विशाल वन्यजीव अभयारण्य है। इसका क्षेत्रफल लगभग 2073 वर्ग किलोमीटर है। इसकी स्थापना वर्ष 1986 में की गई थी।
- भौगोलिक विस्तार और जिले: यह अभयारण्य मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के 5 जिलों में फैला हुआ है: मेरठ (मुख्यालय), मुजफ्फरनगर, बिजनौर, हापुड़, और अमरोहा।
- नदियां और पारिस्थितिकी: यह पूरा अभयारण्य पवित्र गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र (बांगर और खादर) के किनारों पर बसा है। गंगा की पुरानी जलधारा, बूढ़ी गंगा, इसके बीच से होकर गुजरती है, जो दलदली भूमि का निर्माण करती है। यहाँ ऊंची घास के मैदान, शीशम, जामुन और बबूल पाए जाते हैं।
- विशिष्ट वन्यजीव (राजकीय पशु): दुधवा के बाद, उत्तर प्रदेश के राजकीय पशु ‘बारहसिंगा’ की सबसे अच्छी आबादी यहीं पाई जाती है।
- राजकीय पक्षी: उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी ‘सारस’ इस अभयारण्य के वेटलैंड्स में बहुतायत में निवास करता है।
- गंगा नदी के इस हिस्से में गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल और ऊदबिलाव पाए जाते हैं।
8. सोहागीबरवा वन्यजीव अभयारण्य (1987)
- भौगोलिक स्थिति: यह महराजगंज जिले में स्थित है। इसकी स्थापना 1987 में हुई और यह 428 वर्ग किलोमीटर में फैला है।
- अंतरराष्ट्रीय और अंतर्राज्यीय सीमाएं: यह अभयारण्य उत्तर में नेपाल की सीमा (चितवन नेशनल पार्क के करीब) और पूर्व में बिहार की सीमा (वाल्मीकि टाइगर रिजर्व) से जुड़ा हुआ है।
- तराई आर्क लैंडस्केप (TAL): यह अभयारण्य तराई आर्क लैंडस्केप का एक महत्वपूर्ण ‘इकोलॉजिकल कॉरिडोर’ (पारिस्थितिक गलियारा) है। यह बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व और नेपाल के जंगलों को आपस में जोड़ता है। यह प्राकृतिक मार्ग बाघों और हाथियों के सुरक्षित आवागमन के लिए काम करता है, जो उनकी ‘आनुवंशिक विविधता’ को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- नदी तंत्र और स्थलाकृति: इस अभयारण्य की पूर्वी सीमा का निर्धारण गंडक नदी (जिसे नेपाल में नारायणी कहा जाता है) करती है। तराई और बाढ़ के मैदानों में स्थित होने के कारण, यहाँ प्राकृतिक रूप से कई ‘गोखुर झीलें’ और ताल निर्मित हुए हैं, जो जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों के लिए एक आदर्श आवास बनाते हैं।
- वनस्पतियां और वन्यजीव: यहाँ मुख्य रूप से ‘उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन’ पाए जाते हैं। इनमें साल, शीशम, हल्दू और जामुन के वृक्ष बहुतायत में हैं। यहाँ तेंदुए, चीतल, पाढ़ा (Hog deer), जंगली सूअर और अजगर जैसे जीव स्थायी रूप से निवास करते हैं। इसके अलावा, यह क्षेत्र नेपाल और बिहार के बीच से गुजरने वाले बाघों और हाथियों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल है।
9. सुहेलवा वन्यजीव अभयारण्य (1988)
- भौगोलिक स्थिति और विस्तार: यह अभयारण्य मुख्य रूप से तीन जिलों में फैला है — बलरामपुर, श्रावस्ती और गोंडा। यह नेपाल के साथ लगभग 120 किलोमीटर लंबी खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। इसकी स्थापना 1988 में हुई और क्षेत्रफल 452 वर्ग किलोमीटर है।
- पारिस्थितिकी और परिदृश्य: यह क्षेत्र ‘भाबर और तराई’ पारिस्थितिकी तंत्र का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ सघन ‘उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन’ पाए जाते हैं, जिनमें साल, खैर, शीशम, जामुन और सागौन के वृक्षों की बहुलता है।
- नदियाँ और जलाशय: इसके बीच से कई पहाड़ी नाले बहते हैं जो राप्ती नदी तंत्र में मिल जाते हैं। यहाँ भगवानपुर, चित्तौड़गढ़ और गिरगिटही जैसे जलाशय हैं।
- मुख्य वन्यजीव: यहाँ बंगाल टाइगर, तेंदुआ, भालू (Sloth Bear), जंगली कुत्ते, चीतल, काकड़ (Barking Deer), जंगली सूअर और नीलगाय पाए जाते हैं। सर्दियों में यहाँ प्रवासी पक्षी भी आते हैं।
- बाघ गलियारा (Tiger Corridor): पारिस्थितिक दृष्टिकोण से यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नेपाल के ‘बांके राष्ट्रीय उद्यान’और ‘बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान’ के साथ जुड़कर एक अत्यंत महत्वपूर्ण ‘ट्रांस-बाउंड्री टाइगर कॉरिडोर’ (पार-देशीय बाघ गलियारा) का निर्माण करता है।
- सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व: यहाँ ‘थारू’ जनजाति के गाँव बसे हुए हैं। इसका एक बड़ा हिस्सा श्रावस्ती जिले में है, जो बौद्ध धर्म का पवित्र तीर्थस्थल (बुद्ध सर्किट) है। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए इसे ‘इको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) घोषित किया जा रहा है और यहाँ ‘इको-टूरिज्म सर्किट’ विकसित किया जा रहा है।
10. कछुआ वन्यजीव अभयारण्य (1989)
यह भारत का एक अत्यंत विशिष्ट और संभवतः देश का एकमात्र मीठे पानी का कछुआ अभयारण्य है। परीक्षाओं के लिए इसका समसामयिक घटनाक्रम (स्थान परिवर्तन) सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
- मूल स्थापना और उद्देश्य: इसकी स्थापना 21 दिसंबर 1989 को ‘गंगा एक्शन प्लान’ (GAP) के तहत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी में मांसाहारी कछुओं को छोड़कर नदी के पानी को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करना था (ताकि वे नदी के सड़े-गले पदार्थों को खाकर उसे साफ रख सकें)।
- मूल भौगोलिक स्थिति: शुरुआत में यह अभयारण्य वाराणसी जिले में गंगा नदी के 7 किलोमीटर लंबे जलीय क्षेत्र (राजघाट के मालवीय रेलवे पुल से लेकर रामनगर किले तक) में स्थित था।
- वर्तमान भौगोलिक स्थिति: यह परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। वर्तमान में इस अभयारण्य को वाराणसी से हटाकर प्रयागराज, भदोही और मिर्जापुर जिलों की सीमा में स्थानांतरित कर दिया गया है।
- वर्तमान विस्तार: अब यह नया अभयारण्य प्रयागराज (मेजा के कोठरी गांव) से लेकर भदोही और मिर्जापुर की सीमा तक गंगा नदी के लगभग 30 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में विस्तृत कर दिया गया है।
- विशिष्ट वन्यजीव:
- कछुए: यहाँ मीठे पानी के कछुओं की लगभग 14 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें इंडियन सॉफ्टशेल टर्टल, ‘जियोस्लिम्स हैमिलटोनी’ और नैरो हेडेड टर्टल मुख्य हैं। (नोट: वाराणसी के सारनाथ में इनका एक विशेष प्रजनन केंद्र भी स्थापित किया गया था)।
- अन्य जलीय जीव: मानसून के दौरान इस संरक्षित क्षेत्र में ‘गंगा डॉल्फिन’ (राष्ट्रीय जलीय जीव) भी पाई जाती हैं।
- समसामयिक घटनाक्रम और डी-नोटिफिकेशन:
- स्थान परिवर्तन का कारण: केंद्र सरकार की ‘हल्दिया-वाराणसी अंतर्देशीय जलमार्ग परियोजना’ (National Waterway 1) के विकास में यह अभयारण्य बाधा बन रहा था, क्योंकि जलमार्ग के लिए नदी की ड्रेजिंग (गाद निकालना) आवश्यक थी। इसी कारण मार्च 2020 में वन्यजीव बोर्ड की मंजूरी के बाद इसे वाराणसी से ‘डी-नोटिफाई’ (अधिसूचना रद्द) कर दिया गया।
- इको-सेंसिटिव जोन (ESZ): नए सेंचुरी क्षेत्र को सुरक्षित करने और नदी के किनारों पर होने वाले अवैध बालू खनन को रोकने के लिए सरकार ने इसके इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) का दायरा 1 किलोमीटर से बढ़ाकर 10 किलोमीटर कर दिया है। (अवैध बालू खनन कछुओं के अंडे देने वाले रेतीले किनारों को नष्ट कर देता है)।
📌 क्विक रिवीजन टेबल: उत्तर प्रदेश के प्रमुख वन्यजीव अभयारण्य
| अभयारण्य का नाम | स्थापना वर्ष | संबंधित जिला | प्रमुख नदियां / जल निकाय | परीक्षा उपयोगी विशेष तथ्य |
| चंद्रप्रभा | 1957 | चंदौली | चंद्रप्रभा नदी | राज्य का प्रथम अभयारण्य, राजदरी-देवदरी जलप्रपात, एशियाई शेरों का प्रयोग (1958) |
| किशनपुर | 1972 | लखीमपुर खीरी | शारदा नदी, झादी ताल | दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा, झादी ताल में प्रवासी पक्षी |
| कतरनियाघाट | 1975 | बहराइच (नेपाल सीमा) | घाघरा और गिरवा नदी | घड़ियाल व डॉल्फिन का सफल प्राकृतिक प्रजनन, नेपाल से जुड़ा खाता कॉरिडोर |
| महावीर स्वामी | 1977 | ललितपुर | बेतवा नदी बेसिन | राज्य का सबसे छोटा अभयारण्य (5.4 वर्ग किमी), प्राकृतिक गिद्ध संरक्षण |
| रानीपुर | 1977 | चित्रकूट | विंध्य पर्वत क्षेत्र | 2022 में टाइगर रिजर्व बना, बुंदेलखंड का पहला TR, पन्ना टाइगर रिजर्व से जुड़ाव |
| राष्ट्रीय चंबल | 1979 | आगरा, इटावा | चंबल नदी | त्रि-राज्यीय सीमा, घड़ियाल और डॉल्फिन की बड़ी आबादी, चंबल के बीहड़ |
| कैमूर | 1982 | मिर्जापुर, सोनभद्र | सोन और बेलन नदी | प्रागैतिहासिक गुफा चित्र (लखनिया दरी), मुक्खा जलप्रपात |
| हस्तिनापुर | 1986 | मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, हापुड़, और अमरोहा | गंगा और बूढ़ी गंगा | राज्य का सबसे बड़ा (2073 वर्ग किमी), बारहसिंगा और राजकीय पक्षी सारस |
| सोहागीबरवा | 1987 | महराजगंज | गंडक (नारायणी) नदी | वाल्मीकि TR (बिहार) और नेपाल के बीच कॉरिडोर, गोखुर झीलें |
| सुहेलवा | 1988 | बलरामपुर, श्रावस्ती, गोंडा | राप्ती नदी तंत्र | थारू जनजाति का निवास, बुद्ध सर्किट का हिस्सा |
| कछुआ | 1989 | प्रयागराज, भदोही, मिर्जापुर | गंगा नदी | देश का एकमात्र मीठे पानी का कछुआ अभयारण्य, हल्दिया-वाराणसी जलमार्ग के कारण स्थानांतरित |
निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जाए तो, उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य (UP National Parks and Wildlife Sanctuaries) न केवल राज्य के प्राकृतिक और पारिस्थितिक (Ecological) संतुलन को बनाए रखते हैं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भी यह एक अत्यधिक स्कोरिंग विषय है। तराई क्षेत्र के घने साल वनों से लेकर बुंदेलखंड के चट्टानी पठारों तक फैले Tiger Reserves in UP की भौगोलिक स्थिति और नदियों के अपवाह तंत्र को समझना हर गंभीर एस्पिरेंट के लिए जरूरी है।
हमें उम्मीद है कि इस विस्तृत लेख और हमारे द्वारा विशेष रूप से तैयार किए गए UP Wildlife Map के माध्यम से आपको राज्य के एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान (दुधवा), सभी 4 टाइगर रिजर्व और महत्वपूर्ण अभयारण्यों को विज़ुअलाइज़ करने और याद रखने में बहुत मदद मिलेगी। परीक्षा के समय त्वरित रिवीजन (Quick Revision) के लिए आप ऊपर दी गई तालिका और मैप की PDF फाइल को अपने पास सुरक्षित जरूर रख लें।