प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey in Hindi) भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और युगांतकारी घटना है। यह 23 जून 1757 को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी और भारतीय इतिहास की दिशा पूरी तरह बदल दी। इस विस्तृत लेख में हम प्लासी के युद्ध की पूरी पृष्ठभूमि, उसके कारण, मुख्य घटनाक्रम और उसके परिणामों का गहन अध्ययन करेंगे। किसी भी ऐतिहासिक घटना को समझने के लिए उसके अतीत में जाना आवश्यक है, इसलिए हम इस घटना को शाहजहां के काल से समझना शुरू करेंगे।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मुगल साम्राज्य और बंगाल सूबा
मुगल काल (विशेषकर शाहजहां के शासनकाल) के दौरान मुगल साम्राज्य एक बहुत बड़े भू-भाग पर फैला हुआ था। इसी साम्राज्य का सबसे महत्वपूर्ण, अमीर और उपजाऊ हिस्सा था ‘बंगाल सूबा’। उस समय का बंगाल आज के बंगाल से बहुत अलग और विशाल था। यदि आज के बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा (ओडिशा) और संपूर्ण बांग्लादेश को मिला दिया जाए, तो वह उस समय का बंगाल सूबा बनता था।
- यह प्रांत कृषि और व्यापार दोनों दृष्टियों से इतना समृद्ध था कि इसे मुगल साम्राज्य का “सोने का अंडा देने वाली मुर्गी” कहा जाता था।
- इस विशाल सूबे की राजधानी ढाका थी। प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए शाहजहां ने अपने बेटे ‘शाह शुजा’ को यहाँ का सूबेदार नियुक्त किया था।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का बंगाल में प्रवेश
वर्ष 1651 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में व्यापार करने की पहली औपचारिक अनुमति शाह शुजा द्वारा ही दी गई थी। यह अनुमति एक व्यापारिक समझौते के तहत दी गई थी।
- समझौते की शर्त: कंपनी को बंगाल में व्यापार करने के लिए हर साल अपने समझौते को रिन्यू (Renew) कराना होगा और इसके बदले मुगल साम्राज्य को प्रतिवर्ष मात्र 3000 रुपये का कर चुकाना होगा।
- कंपनी के लिए 3000 रुपये की यह रकम ना के बराबर थी। बंगाल से व्यापार इतना लाभदायक हो चुका था कि ब्रिटेन में पूरे एशिया महाद्वीप से आयात होने वाले कुल सामान का लगभग 60% हिस्सा अकेले बंगाल से जाता था। इस भारी मुनाफे ने अंग्रेजों के लालच को बढ़ा दिया।
अंग्रेजों की जड़ें मजबूत होना: तीन गांवों की जमींदारी
सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल का प्रांतीय गवर्नर शाइस्ता खान था। इस दौर में ब्रिटिश कंपनी ने कूटनीति का सहारा लेते हुए बंगाल में अपनी स्थायी बस्तियां बसानी शुरू कर दीं। वर्ष 1698 में, कंपनी ने बंगाल के तीन महत्वपूर्ण गांवों के मालिकों को मात्र 1200 रुपये का भुगतान किया और उन गांवों की जमींदारी खरीद ली। ये तीन गांव थे:
- सुतानुती
- गोविंदपुर
- कालीकत
इन तीनों गांवों को मिलाकर अंग्रेजों ने अपना एक नया और बड़ा व्यापारिक केंद्र स्थापित किया, जिसे आज हम कलकत्ता के नाम से जानते हैं। यहीं पर कंपनी ने अपनी ‘ईस्टर्न प्रेसिडेंसी’ का मुख्यालय बनाया, जिसे बाद में ‘कलकत्ता प्रेसिडेंसी’ कहा जाने लगा। यहीं पर सुरक्षा के नाम पर फोर्ट विलियम नामक किले का निर्माण शुरू हुआ。
मुगल साम्राज्य का पतन और नए राज्यों का उदय

1707 में शक्तिशाली मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद, मुगल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। औरंगजेब के बाद के शासक— बहादुर शाह प्रथम (1707-1712), फर्रुखसियर (1713-1719) और मोहम्मद शाह रंगीला (1719-1748)— बेहद कमजोर साबित हुए।
केंद्र की शक्ति कमजोर पड़ता देख, ताकतवर प्रांतीय गवर्नरों ने खुद को स्वतंत्र घोषित करना शुरू कर दिया। इन स्वायत्त राज्यों को इतिहास में ‘सक्सेसर स्टेट्स’ कहा जाता है। इनमें सबसे प्रमुख थे:
- हैदराबाद – निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह
- अवध – सआदत खाँ
- बंगाल – मुर्शिद कुली खाँ
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मुर्शिद कुली खान (बंगाल का संस्थापक)
वर्ष 1713 में मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने मुर्शिद कुली खान को बंगाल का प्रांतीय गवर्नर नियुक्त किया।
- सत्ता संभालते ही उसने सबसे पहला काम राजधानी को ढाका से हटाकर मुर्शिदाबाद स्थानांतरित करने का किया।
- कमजोर केंद्र का फायदा उठाकर मुर्शिद कुली खान ने खुद को ‘बंगाल का नवाब’ घोषित कर दिया।
- मुर्शिद कुली खान स्वतंत्र बंगाल का संस्थापक भी माना जाता है।
1717 का रॉयल फरमान (मैग्नाकार्टा) – विवाद की असली जड़
1717 में मुगल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा जारी शाही फरमान, बंगाल के नवाबों और अंग्रेजों के बीच विवाद की सबसे बड़ी जड़ बना। ब्रिटिश इतिहासकार ‘ओर्म’ ने इसे कंपनी का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा है।
फरमान क्यों जारी हुआ?
1715 में जॉन सुरमन के नेतृत्व में एक ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल व्यापारिक रियायतें मांगने दिल्ली स्थित मुगल दरबार पहुंचा। इस दल में शामिल अंग्रेज सर्जन डॉ. विलियम हैमिल्टन ने एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे सम्राट फर्रुखसियर की सफल सर्जरी कर उसे ठीक कर दिया। खुश होकर सम्राट ने 1717 में कंपनी को यह शाही फरमान दे दिया।
फरमान की मुख्य शर्तें:
- कंपनी को मात्र 3,000 रुपये वार्षिक कर के बदले पूरे बंगाल सूबे (बंगाल, बिहार, उड़ीसा) में बिना टैक्स व्यापार की छूट मिली।
- कंपनी को ‘दस्तक’ (Dastak – Free Pass) जारी करने का अधिकार भी मिला, जिससे माल पर चुंगी नहीं ली जाती थी।
विवाद की जड़: दस्तक का दुरुपयोग
यह सुविधा सिर्फ कंपनी के आधिकारिक व्यापार के लिए थी, पर भ्रष्ट अंग्रेज अधिकारियों ने इसका निजी व्यापार में जमकर दुरुपयोग किया — यहां तक कि भारतीय व्यापारियों को भी दस्तक बेचने लगे। इससे नवाब का राजस्व लगभग खत्म हो गया, और यही दुरुपयोग आगे चलकर प्लासी के युद्ध का सबसे प्रमुख कारण बना।
बंगाल में यूरोपीय कंपनियों की स्थिति
हुगली नदी (गंगा की उप-नदी) के तटों पर व्यापारिक दृष्टि से यूरोपीय कंपनियों ने अपने अड्डे जमा लिए थे:
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी: कलकत्ता
- फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी: चंद्रनगर
- डच ईस्ट इंडिया कंपनी: चिनसुरा
इनमें अंग्रेज सबसे ज्यादा शक्तिशाली थे क्योंकि कलकत्ता समुद्र के सबसे करीब था और उनके पास फर्रुखसियर का शाही फरमान था।
| नवाब का नाम | कार्यकाल | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| मुर्शिद कुली खान | 1713 – 1727 | स्वतंत्र बंगाल के संस्थापक, राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद लाए |
| शुजाउद्दीन खान | 1727 – 1739 | मुर्शिद कुली खान के दामाद |
| सरफराज खान | 1739 – 1740 | अत्यंत अयोग्य और अक्षम शासक, केवल 1 साल शासन किया |
| अलीवर्दी खान | 1740 – 1756 | तख्तापलट कर सरफराज की हत्या की और सत्ता हथियाई, 16 साल शासन किया |
सरफराज एक अयोग्य शासक था। 1740 में सेनापति अलीवर्दी खान ने तख्तापलट कर सरफराज की हत्या कर दी और सत्ता हथिया ली। अलीवर्दी खान ने 1740 से 1756 तक शासन किया। इसी के समय में मराठों के लगातार आक्रमण हुए, जिससे बचने के लिए उसने उड़ीसा प्रांत मराठों को सौंप दिया और ‘चौथ’ कर देना स्वीकार किया।
मराठा हमलों का बहाना बनाकर ही ब्रिटिश, फ्रेंच और डच कंपनियों ने अपनी-अपनी फैक्ट्रियों की किलाबंदी शुरू कर दी थी। इसी दौरान अंग्रेजों ने कलकत्ता में अपनी बस्ती के चारों ओर एक मजबूत किला बनाना शुरू किया, जिसे ‘फोर्ट विलियम’ नाम दिया गया। अपने ही राज्य में विदेशी कंपनियों की यह मनमानी और सैन्य तैयारी अलीवर्दी खान को बिल्कुल पसंद नहीं थी। अलीवर्दी खान बहुत दूरदर्शी थे। उन्हें पता था कि दक्षिण भारत (कार्नेटिक क्षेत्र) में इन यूरोपीय कंपनियों ने किस प्रकार अपनी किलाबंदी और सेना के दम पर पूरी सत्ता अपने हाथों में ले ली है।
अलीवर्दी खान की मजबूरी:
- वह काफी बूढ़े हो चुके थे
- शारीरिक रूप से नए सैन्य अभियान का नेतृत्व करने में असमर्थ
- उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता: एक योग्य उत्तराधिकारी चुनना
अलीवर्दी खान का कोई पुत्र नहीं था। उसकी तीन बेटियां थीं, जिनके पति मर चुके थे।
उत्तराधिकार के दावेदार:
| दावेदार | रिश्ता (अलीवर्दी खान से) | उम्र |
|---|---|---|
| मीर जाफर | सेनापति, जीजा (Brother-in-law) | वयस्क |
| शौकत जंग | सबसे बड़ी बेटी का बेटा | सिराजुद्दौला से बड़ा |
| सिराजुद्दौला | सबसे छोटी बेटी का बेटा | मात्र 21 वर्ष |
अलीवर्दी खान ने अपनी मृत्यु (1756) से पहले अपनी सबसे छोटी बेटी के बेटे सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी चुना।
गद्दी पर बैठते ही सिराजुद्दौला को भयंकर आंतरिक विद्रोह का सामना करना पड़ा। उसकी मौसी घसीटी बेगम, चचेरा भाई शौकत जंग और सेनापति मीर जाफर ने बगावत कर दी। युवा सिराजुद्दौला ने वीरता दिखाते हुए शौकत जंग को युद्ध में मार गिराया और मीर जाफर को माफ कर अपनी सेना का मुख्य सेनापति बनाए रखा (जो बाद में उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई)।
नोट: सिराजुद्दौला ने मात्र एक साल (1756-1757) ही बंगाल पर शासन किया, लेकिन इसी एक साल में इतिहास की दिशा बदलने वाली कई बड़ी घटनाएं घटीं।
अंग्रेजों से टकराव: फोर्ट विलियम पर हमला और ‘ब्लैक होल घटना’
सिराजुद्दौला ने नवाब बनते ही यूरोपीय कंपनियों को सख्त आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी फैक्ट्रियों की किलाबंदी तुरंत गिरा दें।
- फ्रांसीसी और डच कंपनियों ने नवाब का आदेश मान लिया।
- लेकिन घमंडी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने आदेश मानने से साफ इनकार कर दिया और फोर्ट विलियम को और मजबूत करने लगे।
अपने ही राज्य में विदेशियों की यह गुस्ताखी देख सिराजुद्दौला भड़क गया। 1756 में नवाब ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम पर हमला कर दिया। कलकत्ता काउंसिल का अंग्रेज प्रेसिडेंट रॉबर्ट ड्रेक और ज्यादातर अंग्रेज जान बचाकर फुल्टा द्वीप भाग गए। फोर्ट विलियम पर नवाब का कब्जा हो गया और उसने कलकत्ता का नाम बदलकर ‘अलीनगर’ रख दिया।
ब्लैक होल ट्रेजेडी (The Black Hole Tragedy – 20 जून 1756)
जो अंग्रेज भाग नहीं पाए (कुल 146 लोग, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी थीं), उन्हें सिराजुद्दौला ने एक बहुत ही छोटे से गार्ड रूम (मात्र 18 स्क्वायर फीट) में रात भर के लिए बंद कर दिया। जून की भीषण गर्मी और दम घुटने के कारण अगली सुबह जब दरवाजा खुला, तो 146 में से केवल 23 लोग ही जिंदा बचे थे। बचने वालों में जे.जेड. हॉलवेल नाम का अंग्रेज भी था, जिसने यह कहानी दुनिया को बताई।
ऐतिहासिक विवाद
महत्वपूर्ण नोट: कई इतिहासकारों का मानना है कि 18 स्क्वायर फीट के छोटे से कमरे में 146 लोगों को भरना शारीरिक रूप से असंभव है। इसलिए वे इसे अंग्रेजों द्वारा अपनी जनता की सहानुभूति बटोरने और सिराजुद्दौला को क्रूर साबित करने के लिए बनाई गई एक मनगढ़ंत या फैब्रिकेटेड कहानी मानते हैं।
अंग्रेजों का पलटवार: अलीनगर की संधि
कलकत्ता में हार की खबर मद्रास प्रेसिडेंसी पहुंची। अंग्रेजों ने तुरंत दो दिग्गजों के नेतृत्व में एक विशाल सेना बंगाल भेजी:
- रॉबर्ट क्लाइव – जमीनी सेना का नेतृत्व
- एडमिरल वाटसन – नौसेना का नेतृत्व
इस सैन्य अभियान के दो लक्ष्य:
- बंगाल में ब्रिटिश व्यापारिक केंद्रों और किलों पर वापस अधिकार जमाना
- नवाब सिराजुद्दौला को उसकी गद्दी से हटाना
रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाटसन की सेनाओं ने बंगाल पहुंचते ही तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए फोर्ट विलियम पर जोरदार हमला कर उसे वापस अपने कब्जे में ले लिया। इसके साथ ही, अंग्रेजों ने बंगाल की अन्य फैक्ट्रियों और व्यापारिक केंद्रों पर भी दोबारा अपना अधिकार जमा लिया।
सिराजुद्दौला की मजबूरी:
सिराजुद्दौला ने यह संधि दबाव में आकर की थी, क्योंकि:
- 1756 में ही अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को युद्ध में हराया था।
- अब्दाली का नियंत्रण अब दिल्ली तक फैल चुका था।
- चारों तरफ यह अफवाह थी कि अब्दाली, रोहिल्लाओं और अवध के नवाब के साथ मिलकर बंगाल और बिहार पर आक्रमण कर सकता है।
इसका परिणाम यह हुआ कि 1757 में नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच एक शांति समझौता हस्ताक्षर किया गया, जिसे ‘अलीनगर की संधि’ कहा जाता है। (चूंकि सिराजुद्दौला ने कलकत्ता का नाम अलीनगर रखा था, इसलिए इसी नाम से संधि हुई। अंग्रेजों ने कब्जा करते ही इसका नाम वापस कलकत्ता कर दिया था)।
अलीनगर की संधि की प्रमुख शर्तें
| शर्त | विवरण |
|---|---|
| किलेबंदी की अनुमति | ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अपनी फैक्ट्री के चारों ओर किलेबंदी करने की अनुमति मिल गई। |
| भारी हर्जाना | नवाब को फोर्ट विलियम पर हमले में हुए नुकसान का भारी हर्जाना देना पड़ा। |
| ब्लैक होल का मुआवजा | मारे गए अंग्रेज नागरिकों के परिवारों को भी नवाब द्वारा मुआवजा दिया जाएगा। |
| ब्रिटिश रेजिडेंट | नवाब के दरबार में हमेशा एक ब्रिटिश रेजिडेंट परमानेंटली मौजूद रहेगा। |
महत्वपूर्ण तथ्य: इसी शर्त के तहत ‘विलियम वॉट्स’ को पहला ब्रिटिश रेजिडेंट (दूत) बनाकर सिराजुद्दौला के दरबार में भेजा गया। इसी विलियम वॉट्स ने बाद में दरबार के गद्दारों के साथ मिलकर नवाब के खिलाफ महा-साजिश रची थी।
विलियम वॉट्स को दरबार में भेजने का असली मकसद कूटनीतिक जासूसी था। उसने नवाब से असंतुष्ट लोगों को ढूंढ निकाला और उनके साथ मिलकर एक बहुत बड़ा षड्यंत्र रचा। इस गद्दारों की टोली में शामिल थे:
- मीर जाफर: मुख्य सेनापति
- जगत सेठ: बंगाल का सबसे बड़ा बैंकर
- राय दुर्लभ: दीवान
- ओमीचंद: एक अमीर व्यापारी
रॉबर्ट क्लाइव ने इन सबके साथ एक ‘गुप्त गठबंधन’ किया। तय हुआ कि युद्ध में मीर जाफर सिराजुद्दौला को धोखा देगा और बदले में अंग्रेज उसे बंगाल का नया नवाब बना देंगे। इसके ऐवज में मीर जाफर अंग्रेजों को बेशुमार धन और व्यापारिक छूट देगा。
समझौते की शर्तें:
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सिराजुद्दौला को गद्दी से हटाकर मीर जाफर को नया नवाब बनाएगी
- मीर जाफर को नवाब बनते ही कंपनी, उसकी सेना, नौसेना और रॉबर्ट क्लाइव को बहुत बड़ी-बड़ी रकमें बतौर ईनाम देनी होंगी
- कासिम बाजार और ढाका की फैक्ट्रियों को भी किलेबंदी की अनुमति
- कंपनी के क्षेत्रीय विस्तार को मंजूरी
इस पूरी साजिश को एक औपचारिक कागज पर लिखा गया और सभी पक्षों ने हस्ताक्षर कर दिए।

प्लासी का युद्ध – 23 जून 1757 (Battle of Plassey in Hindi)
दरबार के गद्दारों के साथ पूरी साजिश रचने के बाद, रॉबर्ट क्लाइव ने अपनी चाल चली। उसने सिराजुद्दौला पर ‘अलीनगर की संधि’ का उल्लंघन करने का झूठा आरोप लगाया और इसी बहाने नवाब के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।
23 जून 1757 को भागीरथी नदी के तट पर स्थित ‘प्लासी’ के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ डटीं।
- सिराजुद्दौला की सेना: लगभग 50,000 विशाल सैनिक।
- अंग्रेजों की सेना: मात्र 3,000 सैनिक (रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में)।
संख्या बल को देखते हुए नवाब की जीत पूरी तरह से तय लग रही थी। जैसे ही युद्ध का बिगुल बजा, ब्रिटिश सेना ने तोपों से गोले दागने शुरू कर दिए, लेकिन नवाब की तोपें पूरी तरह शांत रहीं। हैरान और परेशान सिराजुद्दौला ने जब अपने मुख्य सेनापति मीर जाफर से इसका कारण पूछा, तो गद्दार मीर जाफर ने एक सफेद झूठ बोला— “नवाब साहब, कल रात हुई बारिश की वजह से हमारा सारा बारूद भीग कर खराब हो गया है।”
नवाब के पैरों तले जमीन खिसक गई। इसी मौके का फायदा उठाते हुए मीर जाफर ने नवाब को डराया और चाल चलते हुए सलाह दी कि, “सबसे बेहतर यही होगा कि आप तुरंत अपनी जान बचाकर यहां से सुरक्षित निकल जाएं।”
घबराया हुआ 21 वर्षीय युवा सिराजुद्दौला अपने ही सेनापति की बातों में आ गया और युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार, 50 हजार की विशाल फौज होने के बावजूद सिराजुद्दौला रॉबर्ट क्लाइव की मुट्ठी भर सेना से हार गया।
ऐतिहासिक सत्य
सच्चाई यह है कि प्लासी का युद्ध कोई वास्तविक युद्ध था ही नहीं। यह तोप और तलवार से लड़ा गया रण नहीं था, बल्कि छल, कूटनीति और गद्दारी से जीता गया एक ‘सौदा’ था, जिसने भारत की गुलामी का दरवाजा खोल दिया।
प्लासी के युद्ध परिणाम
मैदान से भागे सिराजुद्दौला को जल्द ही पकड़ लिया गया और मीर जाफर के बेटे मीरान ने उसकी बेरहमी से हत्या करा दी। इसके बाद जो हुआ, उसने भारत का इतिहास बदल दिया:
- कठपुतली नवाब की नियुक्ति: वादे के मुताबिक मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया गया। वह पूरी तरह अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली था।
- धन की लूट: मीर जाफर ने खुश होकर ब्रिटिश कंपनी और रॉबर्ट क्लाइव को व्यक्तिगत रूप से लाखों रुपये की रिश्वत और ईनाम दिए।
- 24 परगना की जमींदारी: अंग्रेजों को बंगाल के सबसे उपजाऊ क्षेत्र ’24 परगना’ की जमींदारी सौंप दी गई, जिससे उनका राजस्व कई गुना बढ़ गया।
- फ्री ट्रेड: ब्रिटिश कंपनी को बंगाल के भीतर बिना कोई टैक्स या ड्यूटी दिए व्यापार करने की पूरी छूट मिल गई।
- साम्राज्य की नींव: प्लासी की जीत ने अंग्रेजों के हौसले इतने बढ़ा दिए कि जो कंपनी केवल व्यापार करने आई थी, वह अब किंग-मेकर और भारत की एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई।
प्लासी का युद्ध 1757: प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| क्र.सं. | महत्वपूर्ण विषय / घटना | मुख्य बिंदु / विवरण |
|---|---|---|
| 1 | स्वतंत्र बंगाल का संस्थापक | मुर्शिद कुली खान (इन्होंने राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित की)। |
| 2 | ‘कंपनी का मैग्नाकार्टा’ (1717) | मुग़ल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा जारी ‘शाही फरमान’ (कर-मुक्त व्यापार का अधिकार)। |
| 3 | ब्लैक होल की घटना | 20 जून 1756 को कलकत्ता के फोर्ट विलियम में घटित हुई। |
| 4 | अलीनगर की संधि | 9 फरवरी 1757 को नवाब सिराजुद्दौला और रॉबर्ट क्लाइव के बीच हस्ताक्षरित। |
| 5 | पहला ब्रिटिश रेजिडेंट (दूत) | ‘विलियम वॉट्स’ को सिराजुद्दौला के दरबार में नियुक्त किया गया। |
| 6 | महा-साजिश के मुख्य गद्दार | मीर जाफर (सेनापति), जगत सेठ (बैंकर), राय दुर्लभ (दीवान) और ओमीचंद। |
| 7 | प्लासी के युद्ध की तिथि व स्थान | 23 जून 1757, भागीरथी नदी के तट पर (वर्तमान पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में)। |
| 8 | ब्रिटिश सेना का नेतृत्व | रॉबर्ट क्लाइव ने किया। |
| 9 | तत्कालीन भारत का मुगल सम्राट | आलमगीर द्वितीय (कार्यकाल: 1754-1759)। |
| 10 | सिराजुद्दौला की हत्या | मीर जाफर के बेटे ‘मीरान’ के आदेश पर मोहम्मद बेग ने की। |
| 11 | प्लासी युद्ध का मुख्य परिणाम | मीर जाफर को नवाब बनाया गया और अंग्रेजों को ’24 परगना’ की पूरी जमींदारी मिली। |
निष्कर्ष
प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey 1757) भारतीय इतिहास का वह काला पन्ना है, जिसने देश में ब्रिटिश गुलामी के 200 साल लंबे अध्याय की शुरुआत की। यह युद्ध भारतवासियों के लिए एक ऐतिहासिक सबक है कि जब सत्ता के लालच में ‘घर के भेदी’ दुश्मनों से मिल जाते हैं, तो मजबूत से मजबूत साम्राज्य भी ढह जाता है।
प्लासी के मैदान में मीर जाफर द्वारा किए गए इस छल ने अंग्रेजों के हौसले इतने बुलंद कर दिए कि उन्होंने आगे चलकर 1764 के बक्सर के युद्ध के जरिए भारत पर अपना सैन्य और राजनीतिक शिकंजा पूरी तरह से कस लिया। प्लासी की जीत के साथ ही एक साधारण सी व्यापारिक कंपनी रातों-रात किंग-मेकर और शासक बन बैठी।
संपूर्ण रिवीजन: प्लासी का युद्ध माइंड मैप (Mind Map)
पूरे लेख को विस्तार से पढ़ने के बाद, परीक्षा के समय त्वरित रिवीजन के लिए इस पूरे घटनाक्रम को एक नज़र में समझना बहुत जरूरी है। नीचे दिए गए इस विशेष माइंड मैप (Mind Map) में प्लासी के युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, मुख्य कारण, नवाबों का क्रम और युद्ध के परिणामों को एक ही चित्र में पिरोया गया है। आप इस इन्फोग्राफिक को सेव कर सकते हैं या इसका स्क्रीनशॉट ले सकते हैं, ताकि परीक्षा से ठीक पहले रिवाइज कर पायें।
