भारत का संवैधानिक विकास (1600-1947) | Constitutional Development of India in Hindi

भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India in Hindi) किसी एक दिन या एक वर्ष की घटना का परिणाम नहीं है। आज हम जिस दुनिया के सबसे विस्तृत और लिखित भारतीय संविधान को देखते हैं, वह दरअसल 1600 ई. से लेकर 1950 तक चले एक लंबे ऐतिहासिक, कानूनी और प्रशासनिक सफर की देन है। भारतीय संविधान का इतिहास बहुत गहराई से ब्रिटिश शासन के उन चार्टर और अधिनियमों से जुड़ा है, जिन्होंने हमारे वर्तमान प्रशासन की मजबूत नींव रखी।

यदि आप UPSC, BPSC, State PSC, SSC या किसी भी अन्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो ‘भारतीय राजव्यवस्था’ का यह सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत विषय है। आज हमारी शासन व्यवस्था में मौजूद सुप्रीम कोर्ट, संसदीय प्रणाली और द्विसदनीय व्यवस्था जैसी प्रमुख संस्थाओं के बीज भारत का संवैधानिक इतिहास (Constitutional History of India) तय करने वाले इन्हीं ब्रिटिशकालीन अधिनियमों में छिपे हैं。

Indian Polity Notes in Hindi की इस विस्तृत मास्टर गाइड में हम 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम तक के सभी महत्वपूर्ण चार्टर और अधिनियमों को बिल्कुल आसान भाषा में समझेंगे। अध्ययन की सुविधा और प्रतियोगी परीक्षाओं के सटीक रिवीजन के लिए इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम को दो मुख्य चरणों में बांटा गया है:

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन पारित अधिनियम (1773 से 1853 तक)
  2. ब्रिटिश क्राउन के अधीन पारित अधिनियम (1858 से 1947 तक)

भारत का संवैधानिक विकास (1773-1947) - रेगुलेटिंग एक्ट से स्वतंत्रता अधिनियम तक की पूरी टाइमलाइन

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एक व्यापारिक कंपनी से राजनीतिक शक्ति तक का सफर

Constitutional Development of India के इन जटिल अधिनियमों को पढ़ने से पहले, यह समझना बेहद जरूरी है कि एक व्यापारिक कंपनी (ईस्ट इंडिया कंपनी) आखिर भारत की राजनीतिक भाग्य-विधाता कैसे बन गई। भारत का संवैधानिक इतिहास इसी व्यापारिक कंपनी के राजनीतिक शक्ति बनने के सफर में छिपा है, जिसे हम निम्नलिखित प्रमुख चरणों में समझ सकते हैं:

1. कंपनी की स्थापना (1600 ई. का राजलेख)

ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) की स्थापना 31 दिसंबर 1600 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के एक रॉयल चार्टर (राजलेख) द्वारा की गई थी।

  • शुरुआत में इस चार्टर ने कंपनी को पूर्वी देशों (East Indies) के साथ व्यापार करने का केवल 15 वर्षों का एकाधिकार (Monopoly) दिया था।
  • (महत्वपूर्ण तथ्य): बाद में 1609 ई. में ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम ने एक नया चार्टर जारी करके इस एकाधिकार को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया था।

2. प्रशासनिक शक्तियों की शुरुआत (1726 का राजलेख)

भारत में संवैधानिक विकास का यह पहला विकेंद्रीकरण (Decentralization) था।

  • इसके तहत कलकत्ता (बंगाल), बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नरों को अपनी-अपनी प्रेसीडेंसी के लिए कानून और नियम बनाने की शक्ति दे दी गई।
  • इससे पहले यह शक्ति इंग्लैंड स्थित कंपनी के ‘निदेशक मंडल’ (Board of Directors) के पास हुआ करती थी।

3. व्यापार से सत्ता पर कब्ज़ा: युद्ध और संधियाँ

शुरुआत में कंपनी का उद्देश्य केवल व्यापार करके मुनाफा कमाना था। लेकिन मुग़ल साम्राज्य के पतन और भारत की राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर कंपनी ने युद्धों का सहारा लिया:

  • प्लासी का युद्ध (1757): रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर कंपनी ने भारत में राजनीतिक सत्ता की नींव रखी।
  • बक्सर का युद्ध (1764): यह एक निर्णायक युद्ध था। इसमें मीर कासिम, अवध के नवाब और मुग़ल सम्राट की संयुक्त सेना को हराने के बाद कंपनी की सत्ता पूरी तरह स्थापित हो गई।
  • इलाहाबाद की संधि (1765): इस संधि के तहत मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के ‘दीवानी अधिकार’ (राजस्व/Tax वसूलने का अधिकार) सौंप दिए। यहीं से कंपनी एक व्यापारिक संस्था के साथ-साथ एक ‘क्षेत्रीय शक्ति’ बन गई।

4. बंगाल में ‘द्वैध शासन’ की लूट (1765-1772)

दीवानी अधिकार मिलने के बाद, 1765 में रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में ‘द्वैध शासन’ लागू किया। यह एक ऐसी अजीब और शोषणकारी व्यवस्था थी जिसमें:

  • पैसा और ताकत (दीवानी): कंपनी के पास आ गई।
  • प्रशासनिक और कानूनी जिम्मेदारी (निजामत): बिना किसी अधिकार और पैसे के बंगाल के नवाब पर छोड़ दी गई। यानी, कंपनी के पास बिना जिम्मेदारी का अधिकार था, और नवाब के पास बिना अधिकार की जिम्मेदारी

5. ब्रिटिश संसद का हस्तक्षेप क्यों हुआ? (रेगुलेटिंग एक्ट की पृष्ठभूमि)

द्वैध शासन ने बंगाल की जनता का भयानक शोषण किया, जिसने ब्रिटिश संसद को हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर दिया। इसके मुख्य कारण थे:

  • कंपनी के कर्मचारियों का भ्रष्टाचार: कंपनी के अधिकारी भारत से निजी व्यापार करके करोड़ों रुपये कमा रहे थे (इंग्लैंड में इन्हें व्यंग्य में ‘नवाब’ कहा जाने लगा), जबकि खुद ईस्ट इंडिया कंपनी घाटे में जा रही थी।
  • 1770 का भयंकर अकाल: बंगाल में पड़े अकाल में एक-तिहाई आबादी खत्म हो गई, लेकिन कंपनी ने टैक्स वसूलना कम नहीं किया।
  • 1 मिलियन पाउंड का कर्ज: कंपनी के दिवालिया होने की नौबत आ गई और उसने 1772 में ब्रिटिश सरकार से 10 लाख पाउंड के कर्ज की मांग की।

इस कर्ज की मांग ने ब्रिटिश संसद (लंदन) को चौंका दिया। लॉर्ड नॉर्थ की सरकार ने एक ‘गुप्त समिति’ का गठन किया। इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर इस अनियंत्रित व्यापारिक कंपनी पर लगाम कसने के लिए ‘विनियमन’ (Regulation) की शुरुआत हुई और भारत के संवैधानिक विकास का पहला अध्याय—1773 का रेगुलेटिंग एक्ट—अस्तित्व में आया।

भारत के संवैधानिक विकास की टाइमलाइन (1773 – 1947)

ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के प्रशासन को नियंत्रित और सुव्यवस्थित करने के लिए समय-समय पर कई महत्वपूर्ण चार्टर और अधिनियम पारित किए गए। 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से शुरू हुआ यह ऐतिहासिक सफर, 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act) पर जाकर संपन्न हुआ।

UPSC, State PSC, SSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर इन अधिनियमों का कालक्रम और उनके मुख्य प्रावधानों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। छात्रों के त्वरित रिवीजन और घटनाओं के क्रम को आसानी से याद रखने के लिए, हमने नीचे भारत के संवैधानिक इतिहास की एक इंटरैक्टिव टाइमलाइन तैयार की है।

इस टाइमलाइन का उपयोग कैसे करें?

  • विस्तृत नोट्स (नीले बॉक्स): जिन अधिनियमों के बॉक्स नीले रंग में हैं, उनके डिटेल नोट्स हमारी वेबसाइट पर पब्लिश हो चुके हैं। आप सीधे बटन पर क्लिक करके उनकी विस्तृत जानकारी पढ़ सकते हैं।
  • आने वाले नोट्स (ग्रे बॉक्स): जिन अधिनियमों के बॉक्स ग्रे रंग में हैं, उनके विस्तृत नोट्स हमारी टीम द्वारा तैयार किए जा रहे हैं। वे बहुत जल्द इसी पेज पर लिंक कर दिए जाएंगे।

आइए 1773 से 1947 तक के इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को एक नज़र में समझते हैं:

1773 रेगुलेटिंग एक्ट (Regulating Act)

ईस्ट इंडिया कंपनी को नियंत्रित करने का ब्रिटिश संसद का पहला प्रयास। इसके तहत बंगाल के गवर्नर को ‘गवर्नर-जनरल’ बनाया गया और कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई。

1773 का रेगुलेटिंग एक्ट पढ़ें →

1781 संशोधन अधिनियम (Act of Settlement)

यह एक्ट 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए लाया गया था। इसके द्वारा गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद को सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर दिया गया。

1781 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट पढ़ें →

1784 पिट्स इंडिया एक्ट (Pitt’s India Act)

इस अधिनियम ने कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया। राजनीतिक मामलों के नियंत्रण के लिए इंग्लैंड में ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ (Board of Control) की स्थापना की गई。

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट पढ़ें →

1793 चार्टर एक्ट (Charter Act)

इस एक्ट के माध्यम से कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया। साथ ही यह तय किया गया कि ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के सदस्यों का वेतन भारतीय राजस्व से दिया जाएगा。

1793 का चार्टर एक्ट पढ़ें →

1813 चार्टर एक्ट (Charter Act)

भारत में कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया (केवल चाय और चीन के साथ व्यापार छोड़कर)। भारतीयों की शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने का ऐतिहासिक प्रावधान किया गया。

1813 का चार्टर एक्ट पढ़ें →

1833 चार्टर एक्ट (Charter Act)

केंद्रीकरण की दिशा में निर्णायक कदम। बंगाल के गवर्नर-जनरल को ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ बना दिया गया (लॉर्ड विलियम बेंटिक)। कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूरी तरह से समाप्त कर दिए गए。

1833 का चार्टर एक्ट पढ़ें →

1853 चार्टर एक्ट (Charter Act)

इस एक्ट ने पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी (कानून बनाने वाले) और कार्यकारी कार्यों को अलग किया। सिविल सेवकों की भर्ती के लिए खुली प्रतियोगिता परीक्षा (Open Competition) की शुरुआत की गई。

1853 का चार्टर एक्ट (जल्द आ रहा है)

1858 भारत शासन अधिनियम (Govt. of India Act)

1857 की महान क्रांति के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी) के हाथों में चला गया और गवर्नर-जनरल को ‘वायसराय’ कहा जाने लगा。

1858 का अधिनियम (जल्द आ रहा है)

1861 भारत परिषद अधिनियम (Indian Councils Act)

भारत में कानून बनाने की प्रक्रिया में पहली बार भारतीयों को शामिल करने की शुरुआत हुई। साथ ही वायसराय को आपातकाल में अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की महत्वपूर्ण शक्ति प्रदान की गई。

1861 का अधिनियम (जल्द आ रहा है)

1892 भारत परिषद अधिनियम (Indian Councils Act)

इस अधिनियम ने विधान परिषदों के सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने और कार्यपालिका से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया। हालाँकि, उन्हें बजट पर मतदान (Voting) का अधिकार नहीं मिला था。

1892 का अधिनियम (जल्द आ रहा है)

1909 मार्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms)

इस एक्ट ने भारत में ‘सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व’ को वैधानिक रूप दिया। मुसलमानों के लिए ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ (Separate Electorate) की शुरुआत करके अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति लागू की。

मार्ले-मिंटो सुधार (जल्द आ रहा है)

1919 मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu-Chelmsford)

इस अधिनियम द्वारा प्रांतों में ‘द्वैध शासन’ (Dyarchy) लागू किया गया। इसके अलावा, भारत में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली और केंद्र में द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameralism) की शुरुआत हुई。

मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (जल्द आ रहा है)

1935 भारत शासन अधिनियम (Govt. of India Act)

यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे लंबा दस्तावेज था, जिस पर वर्तमान भारतीय संविधान आधारित है। इसमें अखिल भारतीय संघ की स्थापना, प्रांतीय स्वायत्तता और शक्तियों के विभाजन (3 सूचियाँ) का प्रावधान था。

1935 का अधिनियम (जल्द आ रहा है)

1947 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Independence Act)

माउंटबेटन योजना पर आधारित इस एक्ट ने भारत में ब्रिटिश राज को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत को दो स्वतंत्र डोमिनियन—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित कर दिया गया。

1947 का स्वतंत्रता अधिनियम (जल्द आ रहा है)

भारत का संवैधानिक विकास: कंपनी के अधीन पारित प्रमुख अधिनियम (1773 – 1853)

ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन पारित अधिनियम (1773-1853) - UPSC Polity Notes in Hindi
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में पारित प्रमुख चार्टर और अधिनियम (1773 – 1853)

नीचे दिए गए सभी अधिनियमों के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं, जो भारतीय संविधान का इतिहास (Constitutional History of India) समझने के लिए बेहद जरूरी हैं और अक्सर UPSC, State PSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सीधे पूछे जाते हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए आप हर अधिनियम के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक कर सकते हैं:

1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 (Regulating Act of 1773)

यह भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियंत्रित और विनियमित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा उठाया गया पहला कदम था।

  • गवर्नर-जनरल का पद: बंगाल के गवर्नर पद का नाम बदलकर ‘बंगाल का गवर्नर-जनरल’ कर दिया गया। पहले गवर्नर-जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स बने। उनकी सहायता के लिए 4 सदस्यीय कार्यकारी परिषद बनाई गई।
  • सुप्रीम कोर्ट की स्थापना: इसी एक्ट के तहत 1774 में कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे। इसके पहले मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
  • भ्रष्टाचार पर रोक: कंपनी के कर्मचारियों को अपना निजी व्यापार करने और भारतीयों से उपहार या रिश्वत लेने पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया गया।

1773 का रेगुलेटिंग एक्ट विस्तार से पढ़ें →

2. एक्ट ऑफ सेटलमेंट, 1781 (Act of Settlement)

इसे 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों (विशेषकर सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल के बीच होने वाले विवादों) को दूर करने के लिए लाया गया था। इसे ‘संशोधनात्मक अधिनियम’ (Amending Act) भी कहा जाता है।

  • सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों में कटौती: गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद को उनके ‘आधिकारिक कार्यों’  के लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर (छूट) कर दिया गया।
  • राजस्व मामलों में छूट: राजस्व वसूली से जुड़े मामलों को भी सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया।
  • हिंदू-मुस्लिम कानून: यह तय किया गया कि कलकत्ता के निवासियों के मुक़दमे उनके अपने धार्मिक कानूनों (हिंदुओं के लिए हिंदू कानून और मुस्लिमों के लिए मुस्लिम कानून) के हिसाब से तय किए जाएंगे।

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3. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 (Pitt’s India Act)

ब्रिटेन के तत्कालीन युवा प्रधानमंत्री विलियम पिट द्वारा लाए गए इस एक्ट ने कंपनी के प्रशासन में एक बड़ा बदलाव किया。

  • कार्यों का विभाजन (द्वैध शासन): पहली बार कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को अलग-अलग किया गया।
  • बोर्ड ऑफ कंट्रोल: व्यापारिक मामलों का प्रबंधन पहले की तरह ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ के पास रहा, लेकिन राजनीतिक, सैन्य और राजस्व मामलों के नियंत्रण के लिए इंग्लैंड में 6 सदस्यीय ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ (नियंत्रक मंडल) की नई स्थापना की गई।
  • ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र: भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को इतिहास में पहली बार “ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र” (British possessions in India) कहा गया।

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट पढ़ें →

4. 1786 का अधिनियम (Act of 1786)

यह एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण एक्ट था जो विशेष रूप से लॉर्ड कॉर्नवालिस को बंगाल का गवर्नर-जनरल बनने के लिए राजी करने हेतु लाया गया था। कॉर्नवालिस ने पद स्वीकार करने के लिए दो शर्तें रखी थीं, जिन्हें इस एक्ट में मान लिया गया:

  • वीटो पावर : गवर्नर-जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णयों को रद्द करने और अपने निर्णय लागू करने का अधिकार दिया गया。
  • प्रधान सेनापति (Commander-in-Chief): गवर्नर-जनरल को ही सेना के प्रधान सेनापति की शक्तियाँ भी सौंप दी गईं।

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5. चार्टर एक्ट, 1793 (Charter Act of 1793)

इस एक्ट के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के प्रशासन को और अधिक सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया。

  • व्यापारिक अधिकारों का विस्तार: ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • वेतन का भुगतान (सबसे महत्वपूर्ण): यह तय किया गया कि अब ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ (नियंत्रक मंडल) के सदस्यों और कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से ही दिया जाएगा। यह व्यवस्था 1919 तक चलती रही।
  • गवर्नर-जनरल की शक्तियां: लॉर्ड कॉर्नवालिस को दी गई ‘वीटो पावर’ को भविष्य के सभी गवर्नर-जनरलों और गवर्नरों के लिए विस्तारित कर दिया गया।

1793 का चार्टर एक्ट विस्तार से पढ़ें →

6. चार्टर एक्ट, 1813 (Charter Act of 1813)

यह भारतीय शिक्षा और व्यापार के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, क्योंकि इसमें भारत के लिए पहली बार बजट का प्रावधान किया गया था।

  • एकाधिकार की समाप्ति: भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया। हालांकि, चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा।
  • शिक्षा पर बजट: भारतीय साहित्य के पुनरुद्धार और विज्ञान की उन्नति के लिए (अर्थात भारतीयों की शिक्षा के लिए) पहली बार प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने का ऐतिहासिक प्रावधान किया गया।
  • ईसाई मिशनरियों का प्रवेश: भारत में लोगों को ‘प्रबुद्ध’ करने के नाम पर ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार की अनुमति दे दी गई।

1813 का चार्टर एक्ट विस्तार से पढ़ें →

7. चार्टर एक्ट, 1833 (Charter Act of 1833)

यह भारत में केंद्रीकरण की दिशा में ब्रिटिश सरकार का सबसे निर्णायक कदम था।

  • ‘भारत’ का गवर्नर-जनरल: बंगाल के गवर्नर-जनरल को संपूर्ण ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ बना दिया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने。
  • विशुद्ध प्रशासनिक निकाय: कंपनी के बचे हुए व्यापारिक अधिकार (चाय और चीन के साथ व्यापार) भी पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। अब कंपनी एक व्यापारिक संस्था की जगह पूरी तरह से एक प्रशासनिक निकाय बन गई।
  • प्रथम विधि सदस्य: गवर्नर-जनरल की परिषद में एक नया (चौथा) सदस्य—विधि सदस्य (Law Member) के रूप में जोड़ा गया। पहले विधि सदस्य लॉर्ड मैकाले थे。

1833 का चार्टर एक्ट विस्तार से पढ़ें →

8. चार्टर एक्ट, 1853 (Charter Act of 1853)

यह 1793 से 1853 के बीच पारित किए गए चार्टर अधिनियमों की श्रृंखला का अंतिम अधिनियम था।

  • शक्तियों का पृथक्करण: पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी (Legislative) और कार्यकारी (Executive) कार्यों को अलग-अलग किया गया। इसके तहत 6 नए पार्षद जोड़े गए, जिन्हें ‘विधान पार्षद’ कहा गया。
  • खुली प्रतियोगिता (Civil Services): भारत में सिविल सेवकों की भर्ती और चयन के लिए पहली बार खुली प्रतियोगिता परीक्षा की व्यवस्था शुरू की गई (1854 में इसके लिए मैकाले समिति का गठन हुआ)।
  • स्थानीय प्रतिनिधित्व: पहली बार भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत की गई。

1853 का चार्टर एक्ट (विस्तृत आर्टिकल जल्द आ रहा है)

भारतीय संविधान का इतिहास: ब्रिटिश क्राउन के अधीन पारित अधिनियम (1858 – 1947)

ब्रिटिश क्राउन के अधिनियम (1858-1947) - Constitutional Development of India in Hindi
ब्रिटिश ताज के अधीन पारित महत्वपूर्ण अधिनियम (1858 – 1947)

1857 की महान क्रांति ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव पूरी तरह से हिला दी। इसके बाद ब्रिटिश संसद ने भारत का प्रशासन सीधे अपने (ब्रिटिश ताज के) हाथों में ले लिया। Constitutional Development of India की इस ऐतिहासिक यात्रा में, यहाँ से भारत का संवैधानिक विकास का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है。

आइए भारत के संवैधानिक विकास की इस विस्तृत मास्टर गाइड में ब्रिटिश क्राउन के अधीन पारित इन सभी महत्वपूर्ण अधिनियमों को आसान भाषा में समझते हैं:

9. भारत शासन अधिनियम, 1858 (Government of India Act)

इसे “भारत के शासन को अच्छा बनाने वाला अधिनियम” (Act for the Good Government of India) भी कहा गया。

  • क्राउन का सीधा शासन: ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन पूरी तरह समाप्त कर दिया गया और भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) के हाथों में चला गया。
  • वायसराय (Viceroy) का पद: ‘भारत के गवर्नर-जनरल’ का नाम बदलकर ‘भारत का वायसराय’ कर दिया गया। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने。
  • द्वैध शासन प्रणाली का अंत: 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा बनाए गए ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ और ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ को समाप्त कर दिया गया。
  • भारत सचिव (Secretary of State): भारत के प्रशासन पर नियंत्रण के लिए ‘भारत के राज्य सचिव’ का एक नया पद बनाया गया, जो ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था。

1858 का अधिनियम (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

10. भारत परिषद अधिनियम, 1861 (Indian Councils Act)

यह अधिनियम भारत के संवैधानिक इतिहास में एक युगांतरकारी घटना थी, क्योंकि इससे कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीयों को शामिल करने की शुरुआत हुई。

  • अध्यादेश (Ordinance) की शक्ति: वायसराय को आपातकाल के दौरान विधान परिषद की अनुमति के बिना अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई (जिसकी अवधि 6 माह होती थी)。
  • विभागीय प्रणाली (Portfolio System): लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में शुरू की गई ‘पोर्टफोलियो प्रणाली’ को वैधानिक मान्यता दी गई। यहीं से भारत में कैबिनेट व्यवस्था की नींव पड़ी。
  • विकेंद्रीकरण की शुरुआत: बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसियों को उनकी कानून बनाने की शक्ति वापस लौटा दी गई。

1861 का अधिनियम (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

11. भारत परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act)

यह अधिनियम मुख्य रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में स्थापित) की मांगों के दबाव में लाया गया था。

  • अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली: भारत में पहली बार चुनाव प्रणाली (अप्रत्यक्ष रूप से) की शुरुआत हुई。
  • बजट पर बहस का अधिकार: विधान परिषद के भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने और कार्यपालिका से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। हालांकि, उन्हें बजट पर मतदान (Voting) करने या अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था。

1892 का अधिनियम (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

12. मार्ले-मिंटो सुधार, 1909 (Morley-Minto Reforms)

लॉर्ड मार्ले उस समय भारत सचिव थे और लॉर्ड मिंटो वायसराय। इस एक्ट ने भारत के विभाजन के बीज बो दिए थे。

  • सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Representation): मुसलमानों के लिए ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ (Separate Electorate) का प्रावधान किया गया। इसी कारण लॉर्ड मिंटो को “सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक” कहा जाता है。
  • वायसराय की कार्यपालिका में भारतीय: पहली बार किसी भारतीय को वायसराय की कार्यपालिका परिषद का सदस्य बनाया गया। सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा (S. P. Sinha) पहले भारतीय सदस्य (विधि सदस्य) बने。

1909 मार्ले-मिंटो सुधार (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

13. मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919 (Montagu-Chelmsford)

इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से ‘उत्तरदायी सरकार’ (Responsible Government) की स्थापना करना था。

  • प्रांतों में द्वैध शासन: प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांट दिया गया—‘हस्तांतरित’ (Transferred) और ‘आरक्षित’ (Reserved)
  • द्विसदनीय व्यवस्था: केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधायिका (राज्य परिषद और केंद्रीय विधानसभा) की स्थापना की गई。
  • प्रत्यक्ष चुनाव: देश में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई गई और सीमित संख्या में महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार मिला。
  • लोक सेवा आयोग: इसी एक्ट के प्रावधानों के तहत 1926 में ‘केंद्रीय लोक सेवा आयोग’ (UPSC का पूर्व रूप) का गठन किया गया。

1919 मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

14. भारत शासन अधिनियम, 1935 (Government of India Act)

यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे विस्तृत और लंबा दस्तावेज था। वर्तमान भारतीय संविधान का लगभग 60-70% हिस्सा (लगभग 250 अनुच्छेद) इसी अधिनियम से लिया गया है。

  • अखिल भारतीय संघ (All India Federation): इसमें ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने का प्रावधान था (हालांकि रियासतों के शामिल न होने से यह कभी लागू नहीं हो सका)।
  • शक्तियों का विभाजन: केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों को 3 सूचियों—संघ सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची में बांटा गया。
  • प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy): प्रांतों में ‘द्वैध शासन’ को समाप्त कर दिया गया और उन्हें पूर्ण स्वायत्तता दी गई। द्वैध शासन अब केंद्र में लागू कर दिया गया。
  • संस्थाओं की स्थापना: इसी एक्ट के तहत देश की मुद्रा और साख नियंत्रण के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्थापना हुई और 1937 में दिल्ली में एक ‘संघीय न्यायालय’ (Federal Court) स्थापित किया गया。

1935 का भारत शासन अधिनियम (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

15. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act)

लॉर्ड माउंटबेटन की ‘3 जून की योजना’ (माउंटबेटन प्लान) पर आधारित इस एक्ट ने भारत में ब्रिटिश राज के 190 वर्षों के सफर को समाप्त कर दिया。

  • दो स्वतंत्र डोमिनियन: 15 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन कर दिया गया और दो स्वतंत्र राष्ट्रों—भारत और पाकिस्तान—का निर्माण हुआ。
  • ब्रिटिश सत्ता का अंत: भारत के लिए ‘वायसराय’ और इंग्लैंड में ‘भारत सचिव’ का पद हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया。
  • संविधान सभा को शक्ति: दोनों देशों की संविधान सभाओं को अपने-अपने देश का संविधान बनाने और तब तक प्रशासन चलाने की पूरी संप्रभुता (Sovereignty) दे दी गई。

1947 का स्वतंत्रता अधिनियम (विस्तृत नोट्स जल्द आ रहे हैं)

1947 के बाद: भारतीय संविधान का निर्माण

1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने भारत को आज़ादी तो दे दी थी, लेकिन एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश को चलाने के लिए अपने स्वयं के ‘सर्वोच्च कानून’ (संविधान) की आवश्यकता थी। हालाँकि, इस संविधान को बनाने की प्रक्रिया आज़ादी मिलने से कुछ समय पहले ही शुरू हो गई थी。

संविधान निर्माण के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण सफर के प्रमुख पड़ाव (जो परीक्षाओं में सीधे पूछे जाते हैं) इस प्रकार हैं:

  • संविधान सभा का गठन (1946): भारत का संविधान बनाने के लिए 1946 में ‘कैबिनेट मिशन योजना’ के तहत एक संविधान सभा का गठन किया गया था。
  • पहली बैठक: संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई, जिसमें डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। इसके ठीक दो दिन बाद, 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इसका स्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया。
  • उद्देश्य प्रस्ताव: 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पेश किया। इसी प्रस्ताव ने हमारे संविधान का दर्शन तय किया और बाद में यही हमारी ‘प्रस्तावना’ (Preamble) का आधार बना。
  • प्रारूप समिति (Drafting Committee): आज़ादी मिलने के कुछ ही दिनों बाद, 29 अगस्त 1947 को संविधान का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 7 सदस्यीय ‘प्रारूप समिति’ का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर थे, जिन्हें ‘भारतीय संविधान का जनक’ (Father of Indian Constitution) कहा जाता है。
  • निर्माण में लगा समय: भारत के इस विशाल संविधान को पूरी तरह से लिखकर तैयार करने में ठीक 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। इस दौरान संविधान निर्माताओं ने लगभग 60 देशों के संविधानों का बारीकी से अध्ययन किया था (जिसमें 1935 के भारत शासन अधिनियम का सबसे बड़ा योगदान रहा)।
  • संविधान का अंगीकरण: 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने इस संविधान को पारित कर अपनाया (अंगीकृत किया)। इसीलिए हर साल 26 नवंबर को भारत में ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है。
  • संविधान का लागू होना: अंततः 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान पूरे देश में पूर्ण रूप से लागू कर दिया गया और भारत एक ‘गणतंत्र’ (Republic) बन गया। (26 जनवरी का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 1930 में इसी दिन कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज्य’ दिवस मनाया था)।

इस प्रकार, 1600 ई. में एक व्यापारिक कंपनी के चार्टर से शुरू हुआ भारत का संवैधानिक विकास, 26 जनवरी 1950 को दुनिया के सबसे बड़े और महान लिखित संविधान के लागू होने के साथ अपने ऐतिहासिक मुकाम पर पहुँचा。

निष्कर्ष

भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India) केवल कुछ ऐतिहासिक कानूनों की एक सूची नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की मजबूत नींव है। 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट में कंपनी को नियंत्रित करने के पहले प्रयास से लेकर 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम तक, हर एक चार्टर और एक्ट ने हमारी शासन व्यवस्था (Indian Polity) को एक नया आकार दिया。

आज हम जो संसदीय प्रणाली, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों का विभाजन देखते हैं, वे सब इन्हीं ब्रिटिशकालीन प्रयोगों का ही परिष्कृत रूप हैं। UPSC, State PCS, SSC, और BPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में इन अधिनियमों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं。

मुझे उम्मीद है कि gkgsnotes.com की यह टाइमलाइन और मास्टर गाइड आपके रिवीजन को बहुत आसान बनाएगी। किसी भी अधिनियम को विस्तार से पढ़ने के लिए ऊपर दी गई टाइमलाइन के लिंक्स का उपयोग जरूर करें। अगर आपका कोई सवाल या सुझाव है, तो नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएँ!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) – भारत का संवैधानिक विकास

प्रश्न 1. भारत के संवैधानिक विकास को मुख्य रूप से कितने भागों में बांटा गया है?

उत्तर: अध्ययन की सुविधा और ऐतिहासिक बदलावों के आधार पर इसे दो मुख्य भागों में बांटा गया है: पहला, ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन पारित अधिनियम (1773 से 1853 तक) और दूसरा, ब्रिटिश ताज (Crown) के अधीन पारित अधिनियम (1858 से 1947 तक)।

प्रश्न 2. भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट की स्थापना किस अधिनियम के तहत की गई थी?

उत्तर: 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत। इसके प्रावधानों के अनुसार 1774 में कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) की स्थापना की गई थी, जिसके पहले मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।

प्रश्न 3. किस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार (Trade Monopoly) समाप्त किया गया?

उत्तर: 1813 के चार्टर एक्ट द्वारा कंपनी का भारत में व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया था (हालाँकि चाय और चीन के साथ व्यापार पर एकाधिकार बना रहा)। बाद में 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा इसे पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 4. बंगाल के गवर्नर-जनरल को ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ किस एक्ट द्वारा बनाया गया?

उत्तर: 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा केंद्रीकरण करते हुए बंगाल के गवर्नर-जनरल को संपूर्ण ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ बना दिया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने थे।

प्रश्न 5. भारत में सिविल सेवाओं (Civil Services) के लिए खुली प्रतियोगिता की शुरुआत किस अधिनियम से हुई?

उत्तर: 1853 के चार्टर अधिनियम के तहत पहली बार सिविल सेवकों की भर्ती और चयन के लिए ‘खुली प्रतियोगिता’ परीक्षा की व्यवस्था शुरू की गई थी।

प्रश्न 6. किस अधिनियम के तहत भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया?

उत्तर: 1857 की क्रांति के बाद, 1858 के भारत शासन अधिनियम द्वारा कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश महारानी (Crown) के हाथों में चला गया।

प्रश्न 7. भारत में ‘साम्प्रदायिक निर्वाचन’ (Communal Electorate) का जनक किसे कहा जाता है?

उत्तर: लॉर्ड मिंटो को। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधार के तहत अंग्रेजों ने मुसलमानों के लिए ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ का प्रावधान किया था, जिसने भारत में साम्प्रदायिकता को वैधानिक मान्यता दी।

प्रश्न 8. प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) किस अधिनियम द्वारा लागू किया गया था?

उत्तर: 1919 के भारत शासन अधिनियम (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन लागू किया गया था। इसके तहत प्रांतीय विषयों को ‘हस्तांतरित’ और ‘आरक्षित’ विषयों में बांट दिया गया था।

प्रश्न 9. भारतीय संविधान का सबसे बड़ा स्रोत किस अधिनियम को माना जाता है?

उत्तर: 1935 के भारत शासन अधिनियम को। वर्तमान भारतीय संविधान का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा (संघीय ढांचा, शक्तियों का विभाजन आदि) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी अधिनियम से लिया गया है।

प्रश्न 10. भारत और पाकिस्तान के रूप में दो स्वतंत्र राष्ट्रों का निर्माण किस अधिनियम के तहत हुआ?

उत्तर: 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत। माउंटबेटन योजना पर आधारित इस एक्ट ने भारत में ब्रिटिश राज को समाप्त कर दो स्वतंत्र डोमिनियन बनाए।

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