Act of Settlement 1781 in Hindi: कारण, प्रावधान और महत्व

ईस्ट इंडिया कंपनी पर लगाम कसने के लिए ब्रिटिश संसद ने Regulating Act 1773 लागू किया था। लेकिन, जल्दबाजी और भारत की जमीनी हकीकत को समझे बिना बनाए गए उस कानून ने समस्याओं को सुलझाने के बजाय प्रशासन में भयंकर अव्यवस्था फैला दी। हालात इतने खराब हो गए कि भारत में कंपनी की सरकार (गवर्नर-जनरल) और न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) के बीच खुली जंग छिड़ गई।

इसी गंभीर संवैधानिक संकट को शांत करने और 1773 के एक्ट की कमियों को सुधारने के लिए ब्रिटिश संसद ने 1781 में संशोधन अधिनियम (Amending Act of 1781) पारित किया। चूंकि इस कानून ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच के विवाद का निपटारा (Settlement) किया, इसलिए इतिहास में इसे ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट’ (Act of Settlement 1781) कहा जाता है। कानून की किताबों में इसे बंगाल न्यायिक अधिनियम (Bengal Judicature Act 1781) भी कहा जाता है। UPSC, State PCS और SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह एक बेहद महत्वपूर्ण टॉपिक है। इस आर्टिकल में हम इस एक्ट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कोसीजुरा का प्रसिद्ध मामला और इसके मुख्य प्रावधानों को एकदम सरल भाषा में समझेंगे।

Act of Settlement 1781 in Hindi: कारण और प्रमुख प्रावधान

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एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781: एक नज़र में

पूरा लेख पढ़ने से पहले इस टेबल में दिए गए तथ्यों को देख लीजिए। परीक्षाओं में सीधे प्रश्न ज्यादातर इन्हीं से बनते हैं।

विषयजानकारी
अधिनियम का नामसंशोधन अधिनियम 1781 (Amending Act 1781), जिसे एक्ट ऑफ सेटलमेंट या बंगाल न्यायिक अधिनियम भी कहते हैं
पारित करने वाली संस्थाब्रिटिश संसद
किस एक्ट में संशोधनरेगुलेटिंग एक्ट 1773
उस समय गवर्नर-जनरलवारेन हेस्टिंग्स
कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशसर एलिजा इम्पे
ब्रिटेन के प्रधानमंत्रीलॉर्ड नॉर्थ
तात्कालिक कारणकोसीजुरा का मामला (1779-80)
मुख्य उद्देश्यसुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के अधिकार क्षेत्र को अलग-अलग तय करना
अगला अधिनियमपिट्स इंडिया एक्ट 1784

यहाँ एक बात का ध्यान रखें कि इंग्लैंड में भी ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट’ नाम का एक प्रसिद्ध कानून है, जो 1701 में बना था और ब्रिटिश राजगद्दी के उत्तराधिकार से जुड़ा है। उसका भारत से कोई संबंध नहीं है। इसी तरह ‘घोषणात्मक अधिनियम (Declaratory Act)’ नाम सामान्यतः 1788 के ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट के लिए इस्तेमाल होता है, इसलिए परीक्षा में 1781 के एक्ट के लिए ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट’ या ‘संशोधन अधिनियम’ नाम ही याद रखें।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1781 का अधिनियम (Act of Settlement 1781) अचानक नहीं लाया गया था। इसके पीछे 1774 से लेकर 1780 तक कलकत्ता (बंगाल) में चले भारी प्रशासनिक विवादों की कहानी छुपी है। आइए इसके मुख्य कारणों को समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल के बीच वर्चस्व की जंग

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट ने कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट तो बना दिया, लेकिन उसका अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction), यानी वह किन लोगों और किन मामलों की सुनवाई कर सकता है, यह स्पष्ट नहीं किया था। एक्ट में यह भी साफ नहीं था कि कोर्ट किस कानून के आधार पर फैसला देगा। इसी अस्पष्टता ने टकराव को जन्म दिया।

  • मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पे का मानना था कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा में रहने वाला हर व्यक्ति, चाहे वह कोई आम किसान हो या बड़ा जमींदार, सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।
  • दूसरी ओर, गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स का स्पष्ट मानना था कि ‘राजस्व वसूली’ (Tax Collection) और सरकारी प्रशासन के मामले सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बिल्कुल बाहर हैं।

कोर्ट अंग्रेजी कानून और अंग्रेजी प्रक्रिया से चलता था, जिसे भारतीय जनता न समझती थी, न मानती थी। जब कोर्ट ने जमींदारों और राजस्व अधिकारियों को तलब करना शुरू किया, तो कंपनी की लगान वसूली की पूरी व्यवस्था डगमगाने लगी। इन दोनों के बीच का यह टकराव 1779-1780 में अपने चरम पर पहुंच गया, जब एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने ब्रिटिश संसद को दोबारा भारत के मामलों में हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर दिया। इस घटना को ‘कोसीजुरा का मामला‘ कहा जाता है।

कोसीजुरा का मामला (1779-80)

यह वह ऐतिहासिक घटना थी जिसने ब्रिटिश संसद को भारत के प्रशासनिक मामलों में दोबारा हस्तक्षेप करने पर मजबूर किया। अगस्त 1779 में कलकत्ता के एक व्यापारी काशीनाथ बाबू ने कोसीजुरा (बंगाल) के जमींदार राजा सुंदर नारायण के खिलाफ कर्ज न चुकाने पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा किया। सुप्रीम कोर्ट ने राजा के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया।

गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स और उसकी परिषद ने राजा को आदेश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट का वारंट न माने, क्योंकि राजा कंपनी के राजस्व तंत्र का हिस्सा था, ब्रिटिश नागरिक नहीं। जब सुप्रीम कोर्ट के शेरिफ (अधिकारी) के लोग राजा को पकड़ने गए, तो हेस्टिंग्स ने कंपनी की सेना भेजकर सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों को ही गिरफ्तार करवा लिया। अब टकराव खुलकर सामने था। सरकार और अदालत एक-दूसरे के आदेश मानने को तैयार नहीं थे।

इम्पे को सदर दीवानी अदालत का प्रमुख बनाना (1780)

इस झगड़े को शांत करने के लिए वारेन हेस्टिंग्स ने 1780 में एक रास्ता निकाला। उसने मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पे को कंपनी की सबसे ऊंची दीवानी अदालत, सदर दीवानी अदालत, का भी प्रमुख बना दिया और इसके लिए उन्हें अलग से वेतन दिया गया। इससे कुछ समय के लिए टकराव कम हुआ, लेकिन इंग्लैंड में इसे न्यायाधीश को खुश करने के लिए दिया गया लाभ माना गया। इसी आरोप के चलते 1782 में ब्रिटिश संसद ने इम्पे को वापस बुलाने का फैसला किया। यानी यह समझौता स्थायी हल नहीं था, इसके लिए कानून बदलना ही जरूरी था।

टचेट समिति और संसद में याचिकाएं

‘कोसीजुरा के मामले’ और प्रशासन के इस तरह ठप हो जाने से कलकत्ता के यूरोपीय और भारतीय निवासियों में भारी असंतोष फैल गया। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में रहने वाले ब्रिटिश लोगों की ओर से जॉन टचेट (John Touchet) और जॉन इरविंग ने लंदन स्थित ब्रिटिश संसद (House of Commons) में याचिका भेजी। वारेन हेस्टिंग्स की परिषद और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अपनी-अपनी याचिकाएं भेजीं।

इन याचिकाओं की जांच के लिए ब्रिटिश संसद ने एक समिति बनाई, जिसे जॉन टचेट की याचिका के नाम पर ‘टचेट समिति’ (Touchet Committee) कहा जाता है। इस समिति की रिपोर्ट 1781 में आई, और इसी रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर 1773 के एक्ट की गलतियों को सुधारने के लिए ब्रिटिश संसद ने 1781 में ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट’ (Act of Settlement 1781) पारित किया।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 के मुख्य प्रावधान

इस संशोधन अधिनियम का मूल उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और सरकार के कामकाज का दायरा अलग-अलग तय करना था। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की असीमित शक्तियों पर लगाम लगाई गई और कार्यपालिका (गवर्नर-जनरल) को मजबूती दी गई। परीक्षा के दृष्टिकोण से Act of Settlement 1781 in Hindi के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे।

1. आधिकारिक कार्यों के लिए सुप्रीम कोर्ट से छूट

इस एक्ट के तहत सबसे बड़ा बदलाव यह किया गया कि गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद (Council) के सदस्यों को उनके “आधिकारिक कार्यों” के लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर दिया गया। अर्थात, अपनी ड्यूटी के दौरान लिए गए किसी भी प्रशासनिक फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट उन पर मुकदमा नहीं चला सकता था। इसके अलावा, कंपनी के अन्य कर्मचारियों (जैसे सेना, पुलिस और राजस्व अधिकारी) को भी गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के आदेश पर किए गए कार्यों के लिए सुप्रीम कोर्ट की जवाबदेही से छूट दे दी गई।

2. पिछले टकराव के लिए कानूनी सुरक्षा (क्षतिपूर्ति का प्रावधान)

कोसीजुरा जैसे मामलों में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का विरोध किया था, जो कानूनी रूप से अपराध माना जा सकता था। इसलिए एक्ट ने गवर्नर-जनरल, उसकी परिषद, एडवोकेट-जनरल और उनके आदेश पर काम करने वाले सभी लोगों को इस टकराव के दौरान किए गए कार्यों के लिए कानूनी सुरक्षा (Indemnity) दे दी। आसान शब्दों में, विवाद के समय उठाए गए कदमों के लिए उन पर बाद में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था।

3. राजस्व मामलों में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप समाप्त

एक्ट में यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया कि राजस्व वसूली और उससे जुड़े किसी भी विवाद में सुप्रीम कोर्ट कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। जमींदारों, मालगुजारों और लगान वसूलने वाले किसी भी भारतीय को केवल इसलिए सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं माना जाएगा क्योंकि वे ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करते हैं या कंपनी को लगान देते हैं। राजस्व से जुड़े इन सभी मामलों की सुनवाई और फैसला अब ‘गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल’ के पास ही रहेगा।

4. सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र तय करना

चूंकि 1773 के एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को लेकर भ्रम था, इसलिए इस एक्ट ने इसे साफ-साफ तय कर दिया। सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र कलकत्ता शहर के सभी निवासियों पर रहेगा, चाहे वे भारतीय हों या यूरोपीय। कलकत्ता के बाहर बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कोर्ट का अधिकार केवल ब्रिटिश प्रजा (British subjects) पर रहेगा। यानी कलकत्ता से बाहर की आम भारतीय जनता, जमींदार और राजस्व से जुड़े लोग अब सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर हो गए।

5. भारतीय व्यक्तिगत कानूनों और रीति-रिवाजों की मान्यता

यह इस एक्ट का सबसे ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू था। 1773 के एक्ट की सबसे बड़ी कमी (भारतीयों पर अंग्रेजी कानून थोपना) को सुधारते हुए निर्देश दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट में भारतीयों के उत्तराधिकार, विरासत और अनुबंध (Contract) जैसे मामलों की सुनवाई उनके व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के आधार पर होगी। मुसलमानों के मामले मुस्लिम कानून (शरिया / Mohammedan Law) के अनुसार और हिंदुओं के मामले हिंदू कानून (धर्मशास्त्र / Hindu Law) के अनुसार तय होंगे।

इसके साथ एक विशेष नियम भी बनाया गया। यदि किसी मामले में एक पक्ष हिंदू और दूसरा मुस्लिम हो, तो फैसला प्रतिवादी (Defendant) के कानून के अनुसार होगा। प्रतिवादी वह व्यक्ति होता है जिसके खिलाफ मुकदमा किया गया है।

6. अपील की व्यवस्था में बदलाव

बंगाल में कंपनी की जो प्रांतीय अदालतें (Provincial Courts) काम कर रही थीं, उनके फैसलों के खिलाफ अपील अब सुप्रीम कोर्ट में नहीं जाएगी। इन अपीलों की सुनवाई गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल करेगी, जो सदर दीवानी अदालत के रूप में काम करती थी। यानी कंपनी की अदालतों की पूरी व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट से अलग हो गई। सदर दीवानी अदालत के बड़े दीवानी मामलों (5,000 पाउंड या उससे अधिक मूल्य) में आगे अपील इंग्लैंड में किंग-इन-काउंसिल (सम्राट की परिषद) के पास की जा सकती थी।

7. नियम बनाने की शक्ति

‘गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल’ को प्रांतीय अदालतों और प्रांतीय परिषदों के लिए नियम (Regulations) बनाने का अधिकार दे दिया गया। 1773 के एक्ट के तहत गवर्नर-जनरल के बनाए नियम तभी मान्य होते थे जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट में रजिस्टर कराया जाए, जो एक बड़ी बाधा थी। इस एक्ट ने प्रांतीय अदालतों और परिषदों के लिए बने इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में रजिस्टर कराने की बाध्यता से मुक्त कर दिया। इन नियमों की प्रतियां केवल इंग्लैंड में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और सरकार को भेजनी होती थीं।

8. सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं का सम्मान

इस एक्ट ने आदेश दिया कि अदालतों को अपने नियम बनाते समय और कानूनी प्रक्रियाओं (जैसे वारंट या समन भेजना, या गिरफ्तारी करना) का पालन करते समय भारतीयों की सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं का पूरा सम्मान करना होगा। परिवार में पिता के अधिकार और जाति के नियमों जैसी परंपराओं को ध्यान में रखना जरूरी किया गया, ताकि स्थानीय लोगों की भावनाएं आहत न हों।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 का ऐतिहासिक और संवैधानिक महत्व

भले ही Act of Settlement 1781 कोई नया कानून नहीं था और यह केवल 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट का एक संशोधन था, लेकिन भारतीय कानूनी और प्रशासनिक ढांचे पर इसके प्रभाव अत्यंत गहरे और दूरगामी थे।

पहला, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र का बंटवारा। ब्रिटिश भारत में यह पहला प्रयास था जब सरकार (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary) के कार्यक्षेत्र के बीच एक स्पष्ट ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची गई। दोनों के अधिकार अलग-अलग कर दिए गए, ताकि भविष्य में ‘कोसीजुरा’ जैसा कोई विवाद न हो।

दूसरा, गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल की सर्वोच्चता। इस एक्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि कंपनी की नजर में भारत जैसे विशाल देश को चलाने के लिए एक मजबूत प्रशासक जरूरी है। प्रशासन और राजस्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पंख काट दिए गए और गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल भारत में सबसे शक्तिशाली संस्था बन गई।

तीसरा, भारतीय कानूनों को मान्यता। अंग्रेजों ने यह मान लिया कि पश्चिमी कानूनों को सीधे भारतीय समाज पर नहीं थोपा जा सकता। हिंदू और मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) को दी गई यह आधिकारिक मान्यता आगे चलकर ब्रिटिश भारत और फिर स्वतंत्र भारत के कानूनी ढांचे का एक स्थायी हिस्सा बन गई।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 की सीमाएं

यह एक्ट सरकार और अदालत का झगड़ा तो सुलझा गया, लेकिन इसकी अपनी कमियां भी थीं। सबसे बड़ी कमी यह थी कि सरकार के आधिकारिक कार्यों को अदालत की जांच से बाहर कर देने से कंपनी के अधिकारियों पर कोई न्यायिक नियंत्रण नहीं बचा। आम भारतीय अगर राजस्व अधिकारियों की ज्यादती की शिकायत करना चाहता, तो उसके पास सुप्रीम कोर्ट का रास्ता बंद हो चुका था। दूसरी ओर, लंदन में कंपनी के ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ और ब्रिटिश सरकार के बीच नियंत्रण किसके हाथ में हो, यह सवाल भी अभी अनसुलझा था। इन्हीं कमियों ने तीन साल बाद पिट्स इंडिया एक्ट 1784 का रास्ता तैयार किया।

एक नज़र में: एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 के बदलाव

परीक्षा के अंतिम समय में त्वरित रिवीजन के लिए 1781 के संशोधन अधिनियम के मुख्य बदलावों को इस टेबल के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:

विषय1781 एक्ट का नया प्रावधानप्रभाव / परिणाम
गवर्नर जनरल व काउंसिलआधिकारिक कार्यों के लिए सुप्रीम कोर्ट से पूरी छूट।कार्यपालिका (Executive) अधिक मजबूत और स्वतंत्र हुई।
क्षतिपूर्ति (Indemnity)टकराव के दौरान सरकार के आदेश पर किए गए कार्यों के लिए कानूनी सुरक्षा।कोसीजुरा जैसे मामलों पर आगे मुकदमे का खतरा खत्म हुआ।
राजस्व मामलेटैक्स और लगान वसूली के मामले सुप्रीम कोर्ट के दायरे से पूरी तरह बाहर।कंपनी का राजस्व ढांचा बिना किसी रोक-टोक के सुरक्षित हुआ।
सुप्रीम कोर्ट की सीमाकलकत्ता के सभी निवासियों पर अधिकार, बाहर केवल ब्रिटिश प्रजा पर।कलकत्ता से बाहर की आम भारतीय जनता कोर्ट के दायरे से बाहर हुई।
भारतीय व्यक्तिगत कानूनहिंदुओं के लिए ‘हिंदू लॉ’ और मुस्लिमों के लिए ‘शरिया / मुस्लिम लॉ’ की मान्यता, अलग धर्म होने पर प्रतिवादी का कानून।भारतीयों की धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं का सम्मान हुआ।
अपीलीय शक्तियांप्रांतीय अदालतों की अपील सुप्रीम कोर्ट की बजाय ‘गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल’ के पास।कंपनी की अदालतें सुप्रीम कोर्ट से अलग हो गईं।
नियम बनाने का अधिकारप्रांतीय अदालतों और परिषदों के लिए नियम बनाने का अधिकार गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को मिला।इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में रजिस्टर कराने की बाध्यता समाप्त हुई।

Act of Settlement 1781 Mind Map (क्विक रिवीजन के लिए)

प्रतियोगी परीक्षाओं के अंतिम समय में पूरा आर्टिकल दोबारा पढ़ना हमेशा संभव नहीं होता है। आपकी इसी परेशानी को दूर करने के लिए हमने नीचे एक विस्तृत माइंड मैप (Mind Map) तैयार किया है। इस सिंगल चार्ट के माध्यम से आप 1781 के ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कोसीजुरा मामले, मुख्य प्रावधानों और इसके संवैधानिक महत्व को कुछ ही मिनटों में दोहरा सकते हैं।

Act of Settlement 1781 in Hindi Mind Map - Quick Revision
एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 – क्विक रिवीजन माइंड मैप

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एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 किसे कहते हैं?

1781 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित संशोधन अधिनियम को एक्ट ऑफ सेटलमेंट कहते हैं। इसने रेगुलेटिंग एक्ट 1773 की कमियों को दूर किया और कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट तथा गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के बीच चल रहे अधिकार क्षेत्र के विवाद का निपटारा किया।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 लाने का मुख्य कारण क्या था?

इसका मुख्य कारण रेगुलेटिंग एक्ट 1773 में सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट न होना था, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल के बीच टकराव हुआ। 1779-80 का कोसीजुरा मामला इसका तात्कालिक कारण बना।

कोसीजुरा मामला क्या था?

1779 में काशीनाथ बाबू ने कोसीजुरा के जमींदार राजा सुंदर नारायण पर कर्ज का मुकदमा किया और सुप्रीम कोर्ट ने राजा की गिरफ्तारी का वारंट जारी किया। वारेन हेस्टिंग्स ने राजा को वारंट न मानने को कहा और कंपनी की सेना भेजकर कोर्ट के अधिकारियों को ही गिरफ्तार करवा दिया।

1781 में भारत का गवर्नर-जनरल कौन था?

1781 में वारेन हेस्टिंग्स गवर्नर-जनरल थे। वे 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत बंगाल के पहले गवर्नर-जनरल बने थे।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 के बाद सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र क्या रह गया?

सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र कलकत्ता के सभी निवासियों पर और कलकत्ता के बाहर केवल ब्रिटिश प्रजा पर रह गया। गवर्नर-जनरल और परिषद के आधिकारिक कार्य तथा राजस्व से जुड़े मामले इसके दायरे से बाहर कर दिए गए।

क्या 1781 का एक्ट और इंग्लैंड का 1701 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट एक ही है?

नहीं। इंग्लैंड का 1701 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट ब्रिटिश राजगद्दी के उत्तराधिकार से जुड़ा कानून है, जबकि 1781 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट भारत में कंपनी के शासन और सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों से जुड़ा संशोधन अधिनियम है।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 के बाद कौन सा एक्ट आया?

इसके तीन साल बाद 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट आया, जिसने कंपनी के मामलों पर ब्रिटिश सरकार का सीधा नियंत्रण स्थापित करने के लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल बनाया।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहें तो, 1781 के अधिनियम (Act of Settlement 1781) ने 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या, यानी सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल के बीच के टकराव, को सफलतापूर्वक सुलझा दिया।

लेकिन, ईस्ट इंडिया कंपनी के ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ की मनमानी और भारत में फैले भ्रष्टाचार की समस्या अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। प्रशासन की इन बाकी बची कमियों को दूर करने और कंपनी पर ब्रिटिश संसद का शिकंजा पूरी तरह कसने के लिए, ठीक तीन साल बाद एक नया और बेहद सख्त कानून लाया गया। इतिहास में इस कानून को पिट्स इंडिया एक्ट 1784 (Pitt’s India Act 1784) के नाम से जाना जाता है।

स्रोत और संदर्भ

इस लेख के तथ्य 1781 के संशोधन अधिनियम के प्रावधानों, ब्रिटिश संसद में 1781 में प्रस्तुत टचेट समिति की रिपोर्ट से जुड़े विवरणों और भारतीय विधिक एवं संवैधानिक इतिहास की मानक पुस्तकों से मिलाकर तैयार किए गए हैं। यह लेख सितंबर 2026 में अपडेट किया गया है।

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Nitin Tiwari
✍️ लेखक

Nitin Tiwari

नितिन तिवारी GKGSNotes.com के संस्थापक और मुख्य लेखक हैं। उन्होंने गणित में B.Sc. और भूगोल में M.A. की डिग्री प्राप्त की है तथा D.El.Ed (2017 बैच) भी किया है। इसके अलावा उन्हें 5 वर्षों का शिक्षण अनुभव भी है, जिससे वे छात्रों की जरूरतों और परीक्षा की चुनौतियों को गहराई से समझते हैं। उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाले नितिन जी को भूगोल, इतिहास और सामान्य ज्ञान विषयों में गहरी रुचि है। उनका लक्ष्य है कि हिंदी माध्यम के छात्रों को UPSC, UPPSC, SSC, UP Police जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उच्च गुणवत्ता की अध्ययन सामग्री बिल्कुल निःशुल्क मिले।

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