बंगाल विभाजन 1905: कब हुआ, किसने किया, कारण, प्रभाव और रद्द होना

बंगाल विभाजन (Bangal Vibhajan) की घोषणा 19 जुलाई 1905 को हुई और यह 16 अक्टूबर 1905 को लागू कर दिया गया। इसे लागू करने वाले थे तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन। कागज़ पर इसका कारण प्रशासनिक सुविधा बताया गया, लेकिन असल मकसद बंगाल में उभर रही राष्ट्रवादी चेतना को कुचलना और हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था। इसी एक फैसले ने भारत को उसका पहला सचमुच का जन आंदोलन दिया — स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की पूरी दिशा बदल दी।

बंगाल विभाजन 1905 और स्वदेशी-बहिष्कार आंदोलन (Bangal Vibhajan 1905)
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बंगाल विभाजन 1905: एक नज़र में

विषयविवरण
प्रस्ताव पहली बार कब आयादिसंबर 1903
घोषणा कब हुई19 जुलाई 1905
लागू कब हुआ16 अक्टूबर 1905
किसने कियालॉर्ड कर्जन (वायसराय, 1899–1905)
योजना किसने तैयार कीहर्बर्ट होप रिजले (गृह सचिव)
बताया गया उद्देश्यप्रशासनिक सुविधा
असली उद्देश्यराष्ट्रवाद को कमजोर करना और साम्प्रदायिक फूट डालना
नए प्रांत का नामपूर्वी बंगाल और असम, राजधानी ढाका
नए प्रांत का पहला ले. गवर्नरसर बैम्फील्ड फुलर
विरोध में कौन सा आंदोलन चलास्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (7 अगस्त 1905 से)
कब रद्द हुआ12 दिसंबर 1911, दिल्ली दरबार
किसने रद्द कियासम्राट जॉर्ज पंचम की घोषणा, वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय

एक बात ध्यान रखने योग्य है। कुछ पुस्तकों में घोषणा की तारीख 20 जुलाई 1905 लिखी मिलती है। इसका कारण यह है कि भारत सरकार का प्रस्ताव 19 जुलाई को प्रकाशित हुआ, जबकि लंदन में भारत सचिव की स्वीकृति अगले दिन दर्ज हुई। परीक्षा में सामान्यतः 19 जुलाई 1905 ही सही उत्तर माना जाता है।

बंगाल विभाजन कब हुआ और किसने किया?

बंगाल विभाजन 16 अक्टूबर 1905 को लागू हुआ और इसे लॉर्ड कर्जन ने किया था। इसकी आधिकारिक घोषणा इससे लगभग तीन महीने पहले, 19 जुलाई 1905 को, सरकारी प्रस्ताव के रूप में प्रकाशित की गई थी। इसी विभाजन को इतिहास में ‘बंग-भंग’ भी कहा जाता है।

कर्जन ने इसे प्रशासनिक सुविधा का नाम दिया था। उनका तर्क था कि बंगाल इतना बड़ा प्रांत है कि एक लेफ्टिनेंट गवर्नर उसे ठीक से नहीं चला सकता। लेकिन जिस तरह की रेखा खींची गई, उससे साफ हो गया कि मामला प्रशासन का नहीं, राजनीति का था। भारी जनविरोध के बावजूद सरकार अपने फैसले से टस से मस नहीं हुई।

विभाजन के बाद बंगाल दो हिस्सों में बँट गया। पहला हिस्सा पूर्वी बंगाल और असम नाम का नया प्रांत बना, जिसकी राजधानी ढाका रखी गई और जिसमें चटगाँव, ढाका तथा राजशाही डिवीजन, मालदा, पहाड़ी टिपेरा और असम शामिल थे। दूसरा हिस्सा शेष बंगाल रहा, जिसमें पश्चिम बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा भी जुड़े रहे और जिसकी राजधानी कोलकाता बनी रही।

बंगाल विभाजन क्यों किया गया? असली कारण क्या थे?

बंगाल विभाजन का घोषित कारण प्रशासनिक था, पर असली कारण तीन थे — बंगाल में पनप रहे राष्ट्रवाद को तोड़ना, हिंदू और मुसलमानों के बीच धार्मिक दीवार खड़ी करना, और बंगाली भाषियों को अपने ही प्रांत में अल्पसंख्यक बना देना। नीचे तीनों को विस्तार से समझते हैं।

अंग्रेजों का सरकारी तर्क यह था कि उस समय के बंगाल में आज का पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार, उड़ीसा और असम शामिल थे और उसकी आबादी लगभग 7.8 करोड़ थी। इतने बड़े प्रांत को एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के भरोसे चलाना कठिन था, और पूर्वी बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाके उपेक्षित रह जाते थे। यह तर्क पूरी तरह झूठा नहीं था, पर विभाजन की रेखा जिस तरह खींची गई उसने असली मंशा उजागर कर दी।

कारण एक: बंगाल राष्ट्रवाद का केंद्र था

19वीं शताब्दी के अंत तक बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद का दिल बन चुका था। शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता और क्रांतिकारी चेतना — सबका सबसे बड़ा गढ़ यही था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, अरविंद घोष और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नाम इसी भूमि से निकले थे, और युवा क्रांतिकारियों की सबसे बड़ी जमात भी यहीं तैयार हो रही थी।

अंग्रेज इस बौद्धिक और राजनीतिक केंद्र को कमजोर करना चाहते थे। कर्जन के गृह सचिव हर्बर्ट होप रिजले ने सरकारी नोट में यह बात लगभग खुलकर लिख भी दी थी — संयुक्त बंगाल एक शक्ति है, और बँटा हुआ बंगाल अलग-अलग दिशाओं में खिंचेगा। यही वाक्य पूरे विभाजन की असली नीयत का सबसे सीधा सबूत माना जाता है।

कारण दो: फूट डालो और राज करो की नीति

विभाजन की रेखा धर्म को ध्यान में रखकर खींची गई। पश्चिमी हिस्से में पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के क्षेत्र रखे गए, जहाँ लगभग 5.4 करोड़ की आबादी में बड़ा बहुमत हिंदुओं का था और मुसलमान करीब 90 लाख रह गए। दूसरी ओर पूर्वी बंगाल और असम को मुस्लिम बहुल प्रांत बनाया गया, जहाँ 3.1 करोड़ की आबादी में लगभग 1.8 करोड़ मुसलमान और 1.2 करोड़ हिंदू थे।

कर्जन ने ढाका में मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहा था कि यह नया प्रांत उन्हें ऐसी एकता देगा जो मुस्लिम शासन के बाद उन्होंने कभी नहीं देखी। इस एक वाक्य से मंशा साफ हो जाती है — मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रवादी आंदोलन से अलग करना और ब्रिटिश शासन के पक्ष में खड़ा करना।

कारण तीन: भाषाई विभाजन

यह सिर्फ धार्मिक नहीं, भाषाई चोट भी थी। पश्चिमी हिस्से में बंगाली बोलने वालों की संख्या घटकर लगभग 1.8 करोड़ रह गई, जबकि हिंदी और उड़िया बोलने वालों की संख्या 3.6 करोड़ हो गई। इस तरह बंगालियों को उनके अपने ही प्रांत में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक बना दिया गया। अंग्रेज चाहते थे कि समाज धर्म और भाषा, दोनों आधारों पर बँटा रहे ताकि कोई साझा विरोध खड़ा ही न हो सके।

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बंगाल विभाजन के फलस्वरूप कौन सा आंदोलन शुरू हुआ?

बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन शुरू हुआ। इसकी औपचारिक घोषणा 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में हुई थी, इसीलिए 7 अगस्त को स्वदेशी आंदोलन के प्रारंभ की तिथि माना जाता है। नीचे उस पूरे घटनाक्रम को क्रम से देखते हैं।

बंगाल विभाजन 1905 का घटनाक्रम और स्वदेशी आंदोलन की समयरेखा

दिसंबर 1903: प्रस्ताव और पहली प्रतिक्रिया

दिसंबर 1903 में जब यह प्रस्ताव पहली बार सामने आया कि बंगाल को बाँटा जाएगा, तो बंगाल में विरोध की लहर उठ खड़ी हुई। सुरेंद्रनाथ बनर्जी और कृष्ण कुमार मित्र जैसे नेताओं ने ‘बंगाली’ और ‘हितवादी’ जैसे समाचार पत्रों के जरिए एक जोरदार प्रेस अभियान चलाया, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग विभाजन के दुष्परिणाम समझ सकें।

हजारों लोगों ने विरोध में याचिकाओं पर हस्ताक्षर करके सरकार को भेजना शुरू किया। कांग्रेस के नेता याचिका, भाषण, जनसभा और प्रेस अभियान जैसे उस दौर के संवैधानिक तरीकों से जनता को संगठित कर रहे थे। खास बात यह रही कि जमींदार वर्ग, जिसे आमतौर पर सरकार का समर्थक माना जाता था, वह भी इस बार विरोध में कांग्रेस नेताओं के साथ खड़ा हो गया।

19 जुलाई 1905: घोषणा और जनता का टूटता भरोसा

इतने व्यापक विरोध के बाद भी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। जो बात अब तक अफवाह थी, 19 जुलाई 1905 को उस पर सरकारी मोहर लग गई। इस घोषणा ने जनता में निराशा फैला दी। जो लोग अब तक कांग्रेस के शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों पर भरोसा करते थे, उन्हें लगने लगा कि सिर्फ याचिकाएँ और सभाएँ अब काफी नहीं हैं।

ठीक इसी मोड़ पर कुछ ऐसे नेता सामने आए जिन्हें इतिहास में उग्र राष्ट्रवादी या गरमपंथी कहा जाता है — यानी वे लोग जो अंग्रेजों से विनती के बजाय सीधे टकराव के पक्षधर थे। महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक, पंजाब और उत्तर भारत में लाला लाजपत राय तथा अजीत सिंह, मद्रास में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै, और बंगाल में बिपिन चंद्र पाल तथा अरविंद घोष। इन्होंने विरोध को याचिका की सीमा से निकालकर एक जनांदोलन में बदल दिया।

7 अगस्त 1905: स्वदेशी और बहिष्कार की औपचारिक शुरुआत

7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में एक ऐतिहासिक सभा हुई, जिसमें स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की औपचारिक घोषणा की गई। इस सभा में तय हुआ कि विदेशी वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा, स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, तथा भारतीय उद्योग, हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को फिर से खड़ा किया जाएगा।

16 अक्टूबर 1905: शोक दिवस और राखी दिवस

16 अक्टूबर 1905 को विभाजन लागू हुआ और पूरे बंगाल ने इसे शोक दिवस के रूप में मनाया। लोगों ने उपवास रखा, दुकानें बंद रहीं और सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए। उसी दिन रवींद्रनाथ टैगोर के आवाहन पर इसे राखी दिवस के रूप में भी मनाया गया, जिसमें हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधकर यह संदेश दे रहे थे कि विभाजन उन्हें बाँट नहीं सकता। कोलकाता की सड़कों पर ‘वंदे मातरम्’ और ‘आमार सोनार बांग्ला’ गाते हुए रैलियाँ निकलीं।

वंदे मातरम् और आमार सोनार बांग्ला: आंदोलन की दो आवाजें

वंदे मातरम् — राष्ट्रवाद की आवाज

‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है ‘माँ को प्रणाम’। यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ से लिया गया है और इसमें मातृभूमि को एक देवी के रूप में देखा गया है, जिसकी नदियाँ अमृत जैसी हैं और जिसकी संस्कृति महान है।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत एक युद्धघोष बन गया। जनसभाओं, रैलियों और स्कूलों में इसे गाया जाता, और सुनने वालों में जोश की लहर दौड़ जाती। ब्रिटिश सरकार इस गीत से इतनी घबराई कि उसने इसके सार्वजनिक गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। स्कूल-कॉलेजों में इस पर रोक लगी और जहाँ यह गाया जाता वहाँ पुलिस बल, गिरफ्तारी और दमन होने लगा।

मूल वंदे मातरम् में कुल छह पद हैं। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि इसके पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा। केवल दो पद लेने का कारण यह था कि आगे के पदों में देवी दुर्गा की आराधना है, जो धर्मनिरपेक्ष संविधान के अनुरूप नहीं बैठती।

आमार सोनार बांग्ला — बंगाल की साझी विरासत

‘आमार सोनार बांग्ला’, यानी ‘मेरा स्वर्णिम बंगाल’, रवींद्रनाथ टैगोर ने 1905 में खासतौर पर विभाजन के विरोध में लिखा था। इसमें बंगाल को माँ कहकर उसकी सुंदरता और संस्कृति की प्रशंसा की गई है। ध्यान देने लायक बात यह है कि यह गीत पूर्वी बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी उतना ही लोकप्रिय हुआ जितना पश्चिम में — यही इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना देता है। 1971 में बांग्लादेश ने इसे अपना राष्ट्रगान घोषित किया।

स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के मुख्य पहलू

इस आंदोलन के दो चेहरे थे। बहिष्कार इसका नकारात्मक पक्ष था, जिसका काम ब्रिटिश आर्थिक हितों को चोट पहुँचाना था। स्वदेशी इसका सकारात्मक पक्ष था, जिसका काम भारतीय उद्योगों और संस्थाओं को खड़ा करना था। दोनों साथ-साथ चले।

बहिष्कार का स्वरूप

मैनचेस्टर के कपड़े, लिवरपूल का नमक, ब्रिटिश चीनी और दूसरी आयातित वस्तुओं का बड़े पैमाने पर बहिष्कार हुआ। विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाना विरोध का सबसे चर्चित प्रतीक बन गया। यह बहिष्कार सिर्फ सामान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ब्रिटिश संस्थाओं तक फैल गया। सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों, उपाधियों और सरकारी नौकरियों का बहिष्कार किया गया। वकीलों ने अदालतें छोड़ीं और छात्रों ने सरकारी शिक्षण संस्थान।

यह भी याद रखने योग्य है कि ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का सुझाव सबसे पहले कृष्ण कुमार मित्र ने अपनी पत्रिका ‘संजीवनी’ के माध्यम से दिया था।

स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा

विदेशी वस्तुओं के विकल्प के रूप में भारतीय उद्योग खड़े करने पर जोर दिया गया। इस दौर में कई कपड़ा मिलें, साबुन और माचिस की फैक्ट्रियाँ, राष्ट्रीय बैंक और बीमा कंपनियाँ शुरू हुईं। इस आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी मिसाल आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का उद्यम था। उन्होंने 1892 में मात्र सात सौ रुपये की पूँजी से बंगाल केमिकल वर्क्स शुरू किया था, जो 12 अप्रैल 1901 को बंगाल केमिकल एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड बना और भारत की पहली दवा कंपनी कहलाया। स्वदेशी आंदोलन ने इस उद्यम को नई ऊँचाई दी और यह पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गया।

मद्रास में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने 1906 में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी बनाकर ब्रिटिश जहाजरानी को सीधी चुनौती दी। इसी कारण उन्हें ‘कप्पलोट्टिय तमिळन’ यानी जहाज चलाने वाला तमिल कहा जाता है।

राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन और कार्लाइल सर्कुलर

सरकार ने छात्रों को आंदोलन से दूर रखने के लिए कार्लाइल सर्कुलर जारी किया। यह 10 अक्टूबर 1905 को बंगाल के मुख्य सचिव आर. डब्ल्यू. कार्लाइल ने निकाला था, जिसमें कहा गया कि जो छात्र स्वदेशी सभाओं में जाएँगे या वंदे मातरम् गाएँगे, उनके संस्थानों की सरकारी सहायता, छात्रवृत्ति और विश्वविद्यालय मान्यता छीन ली जाएगी। इसके जवाब में सचींद्र प्रसाद बोस ने एंटी-सर्कुलर सोसाइटी बनाई, जिसने निकाले गए छात्रों को संगठित किया।

जब छात्रों ने सरकारी संस्थान छोड़े तो उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी हो गई। 8 नवंबर 1905 को रंगपुर नेशनल स्कूल खुला, जो देश का पहला राष्ट्रीय विद्यालय माना जाता है। इसके बाद 11 मार्च 1906 को कोलकाता में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education) का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य साहित्यिक, वैज्ञानिक और तकनीकी — तीनों धाराओं में राष्ट्रीय नियंत्रण वाली शिक्षा देना था। इसी परिषद के तत्वावधान में 15 अगस्त 1906 को बंगाल नेशनल कॉलेज शुरू हुआ, जिसके पहले प्राचार्य अरविंद घोष और मानद अधीक्षक सतीश चंद्र मुखर्जी थे।

सांस्कृतिक पुनरुत्थान

इस दौर में देशभक्ति से भरे साहित्य, गीत और कला का तेजी से विकास हुआ। रवींद्रनाथ टैगोर और मुकुंद दास के गीतों ने आम लोगों में जोश भरा। चित्रकला में अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय कला को पाश्चात्य प्रभाव से मुक्त कर अजंता-एलोरा की परंपरा से प्रेरित नई शैली विकसित की, और 1907 में उन्होंने इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना की।

महिलाओं की भागीदारी

यह आंदोलन भारतीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ इसलिए भी है कि इसमें पहली बार शहरी मध्यम वर्ग की महिलाएँ बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी से बाहर निकलीं। उन्होंने जुलूसों, धरनों और सभाओं में हिस्सा लिया। सरला देवी चौधुरानी ने स्वदेशी वस्तुओं की बिक्री के लिए ‘लक्ष्मीर भांडार’ जैसी पहल की और प्रतापादित्य उत्सव तथा वीराष्टमी जैसे आयोजनों से युवाओं में शारीरिक शक्ति और आत्मगौरव की भावना जगाई।

मुसलमानों की भूमिका

पूर्वी बंगाल के अधिकांश ग्रामीण और किसान मुसलमान इस विचार से संतुष्ट थे कि उनका अपना मुस्लिम बहुल प्रांत बनेगा और इससे उनके सामाजिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक अधिकार सुरक्षित होंगे। यही कारण रहा कि बड़ी संख्या में मुसलमानों ने आंदोलन से दूरी बनाए रखी। जमींदारों और नवाबों जैसे उच्च वर्ग ने विभाजन का खुला समर्थन किया, क्योंकि इसमें उन्हें अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ता दिख रहा था।

इसके उलट कई राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं ने आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। मौलाना अबुल कलाम आजाद, लियाकत हुसैन और अब्दुल रसूल जैसे नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम एकता को आगे बढ़ाया और आंदोलन को साम्प्रदायिक सीमाओं से ऊपर उठाने की कोशिश की।

सरकार ने इस दूरी को और चौड़ा किया। 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना को सक्रिय प्रोत्साहन दिया गया, जिसका नेतृत्व नवाब सलीमुल्लाह ने किया। लीग ने शुरुआती वर्षों में ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी दिखाई और विभाजन का समर्थन किया। यह रणनीति सफल रही और बंगाल की राजनीति में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नींव पड़ गई।

एक और सीमा भी याद रखने लायक है — आंदोलन ज्यादातर शहरी मध्यम वर्ग तक सीमित रहा, और आम किसान वर्ग (हिंदू और मुस्लिम दोनों) इससे बड़े पैमाने पर जुड़ नहीं पाया। इसका एकमात्र बड़ा अपवाद बारीसाल था, जहाँ अश्विनी कुमार दत्त की स्वदेश बांधव समिति ने ग्रामीण इलाकों में भी आंदोलन की पैठ बनाई।

महत्वपूर्ण तथ्य: इससे पहले एक बात स्पष्ट कर लेना ज़रूरी है — स्वदेशी की विचारधारा विभाजन से भी पुरानी है। बंगाल के भोलानाथ चंद्र को स्वदेशी की विचारधारा का सबसे पहला प्रवर्तक माना जाता है, जिन्होंने 1905 से काफी पहले ही भारतीय उद्योगों और आत्मनिर्भरता की वकालत शुरू कर दी थी। विभाजन ने इस पहले से मौजूद विचार को एक बड़े जनांदोलन में बदल दिया।

आंदोलन का प्रसार और प्रमुख नेता

शुरुआत में यह आंदोलन बंगाल तक सीमित था और सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा कृष्ण कुमार मित्र के नेतृत्व में शांतिपूर्ण बहिष्कार तक ही चलता रहा। लेकिन जैसे ही गरमपंथी नेता इसमें शामिल हुए, इसका रूप बदल गया। तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और अरविंद घोष ने इसे केवल आर्थिक विरोध न मानकर स्वराज और ब्रिटिश शासन के सीधे विरोध का आंदोलन बना दिया। अरविंद घोष ने इसे धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य का रूप देकर युवाओं को क्रांतिकारी रास्ते की ओर मोड़ा।

बंगाल के प्रमुख नेता

सुरेंद्रनाथ बनर्जी आंदोलन के आरंभिक नेताओं में थे। उन्होंने जनसभाओं, लेखों और भाषणों से जनता को जागरूक किया और विभाजन को राष्ट्रीय एकता पर सीधा हमला बताया। उन्हीं का प्रसिद्ध कथन है कि विभाजन उनके ऊपर बम की तरह गिरा — यानी यह फैसला अचानक, हिंसक और विनाशकारी था। वे अंत तक आंदोलन को संवैधानिक ढंग से चलाने के पक्षधर रहे।

कृष्ण कुमार मित्र बंगाली साप्ताहिक ‘संजीवनी’ के संपादक थे। इसी पत्रिका से उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की कड़ी आलोचना की और सबसे पहले विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का सुझाव रखा।

अरविंद घोष ने आंदोलन को क्रांतिकारी और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का रूप दिया। वे अंग्रेजी दैनिक ‘बंदे मातरम्’ के संपादक बने और अपने तीखे लेखों से युवाओं को आत्मबलिदान के लिए प्रेरित किया। वे ही बंगाल नेशनल कॉलेज के पहले प्राचार्य बने। उन्होंने ‘निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत’ लिखकर आंदोलन को एक वैचारिक ढाँचा भी दिया।

बिपिन चंद्र पाल अपने समय के सबसे प्रभावशाली वक्ताओं में गिने जाते थे। उन्होंने ही अगस्त 1906 में अंग्रेजी दैनिक ‘बंदे मातरम्’ शुरू किया। वे केवल विरोध नहीं, बल्कि साहसिक प्रतिकार के पक्षधर थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने 16 अक्टूबर 1905 को राखी दिवस मनाने की अपील की और ‘आमार सोनार बांग्ला’ जैसे गीत रचकर लोगों को सांस्कृतिक माध्यमों से आंदोलन से जोड़ा। साथ ही वे आंदोलन के उग्र स्वरूप के आलोचक भी थे — उनका मानना था कि पश्चिम को दोष देना गलत रास्ता है और पूर्व-पश्चिम के बीच बेहतर समझ बनाना ज्यादा जरूरी है, इसीलिए वे कुछ समय बाद आंदोलन की सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।

अश्विनी कुमार दत्त ने बरिसाल में आंदोलन की कमान संभाली। उनकी संस्था स्वदेश बांधव समिति ने आंदोलन को शहरों से निकालकर गाँवों तक पहुँचाया। बाद में सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया।

बंगाल के बाहर आंदोलन

महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने इसे अखिल भारतीय रूप दिया। उन्होंने साफ कहा कि बंगाल केवल एक प्रांत नहीं, भारत की चेतना है और उसका विभाजन पूरे देश का अपमान है। अपने अखबारों केसरी (मराठी) और मराठा (अंग्रेजी) के जरिए उन्होंने आंदोलन का प्रचार किया, और गणपति उत्सव तथा शिवाजी उत्सव जैसे आयोजनों को जनसभा और प्रचार का मंच बनाया।

पंजाब में लाला लाजपत राय और अजीत सिंह ने किसानों, छात्रों और आम जनता तक आंदोलन पहुँचाया। अजीत सिंह भगत सिंह के चाचा थे और उन्होंने 1907 में पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन चलाया, जो किसानों के अधिकारों से जुड़ा था। दिल्ली में नेतृत्व सैयद हैदर रजा ने किया, जिन्होंने स्थानीय छात्रों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों को संगठित किया। मद्रास में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने कमान संभाली।

आंदोलन के प्रमुख समाचार पत्र और पत्रिकाएँ

पत्र/पत्रिकासंपादक/संस्थापकभाषा
संजीवनीकृष्ण कुमार मित्रबांग्ला
बंगालीसुरेंद्रनाथ बनर्जीअंग्रेजी
बंदे मातरम्बिपिन चंद्र पाल (संपादक अरविंद घोष)अंग्रेजी
संध्याब्रह्मबांधव उपाध्यायबांग्ला
युगांतरबारींद्र कुमार घोष एवं भूपेंद्रनाथ दत्तबांग्ला
केसरी / मराठाबाल गंगाधर तिलकमराठी / अंग्रेजी

सहयोग सिर्फ भारतीय पत्रकारिता से नहीं मिला। ब्रिटिश पत्रकार एच. डब्ल्यू. नेविंसन भी स्वदेशी आंदोलन से जुड़े रहे — उन्होंने कई महीने भारत में रहकर मैनचेस्टर गार्जियन और डेली क्रॉनिकल के लिए इस आंदोलन पर रिपोर्टिंग की, और बाद में इसे ‘द न्यू स्पिरिट इन इंडिया’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इंग्लैंड के आमूल परिवर्तनवादी (रैडिकल) प्रेस के एक हिस्से ने भी आंदोलन को समर्थन दिया था।

कांग्रेस और स्वदेशी आंदोलन: तीन निर्णायक अधिवेशन

इस आंदोलन को समझने के लिए कांग्रेस के तीन अधिवेशन याद रखना जरूरी है, क्योंकि परीक्षा में सबसे ज्यादा प्रश्न यहीं से बनते हैं।

बनारस अधिवेशन 1905 में अध्यक्ष गोपाल कृष्ण गोखले थे। कांग्रेस ने विभाजन की निंदा की और बंगाल के संदर्भ में स्वदेशी तथा बहिष्कार कार्यक्रम को समर्थन दिया, हालाँकि इसे पूरे देश के लिए स्वीकार नहीं किया गया।

कलकत्ता अधिवेशन 1906 में अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी थे। इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया। यह भारतीय राजनीति का बड़ा मोड़ था, क्योंकि अब तक कांग्रेस केवल सुधारों की माँग करती आई थी।

सूरत अधिवेशन 1907 में अध्यक्ष रासबिहारी घोष थे और यहीं कांग्रेस नरमपंथी तथा गरमपंथी दो हिस्सों में बँट गई, जिसे सूरत विभाजन कहा जाता है। गरमपंथी ही स्वदेशी आंदोलन के मुख्य वाहक थे, इसलिए इस फूट ने आंदोलन की कमर तोड़ दी।

ब्रिटिश सरकार द्वारा आंदोलन का दमन

सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस बल का खुला प्रयोग किया, नेताओं को गिरफ्तार किया, प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसाईं और कई जगह गोली भी चलाई। विरोध सभाओं को अवैध घोषित कर दिया गया, नेशनल स्कूलों की मान्यता छीनी गई और आंदोलन में भाग लेने वाले छात्रों को निष्कासित किया गया। शिक्षकों को नौकरी से निकालने की धमकी दी गई। दूसरी ओर जो भारतीय सरकार का साथ देते थे, उन्हें ‘सर’ जैसी उपाधियाँ और नौकरियाँ देकर आंदोलन से दूर रखा गया।

बरिसाल सम्मेलन, अप्रैल 1906

अप्रैल 1906 में बरिसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता अब्दुल रसूल ने की। सरकार ने वहाँ वंदे मातरम् गाने पर रोक लगा दी थी। जब प्रतिनिधियों ने जुलूस निकालकर यह गीत गाया तो पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया और सम्मेलन जबरन भंग कर दिया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी को गिरफ्तार करके जुर्माना लगाया गया। इस घटना ने पूरे बंगाल में गुस्से की लहर दौड़ा दी और आंदोलन और तेज हो गया।

दमन के लिए बनाए गए प्रमुख कानून

कानूनवर्षउद्देश्य
कार्लाइल सर्कुलर1905छात्रों को स्वदेशी सभाओं से रोकना
राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम1907सार्वजनिक सभाओं पर रोक
विस्फोटक पदार्थ अधिनियम1908क्रांतिकारी गतिविधियों पर नियंत्रण
समाचार पत्र (अपराध उत्तेजन) अधिनियम1908राष्ट्रवादी प्रेस को दबाना
भारतीय प्रेस अधिनियम1910प्रेस पर कठोर जमानत और सेंसरशिप

अरविंद घोष की गिरफ्तारी और बिपिन चंद्र पाल की सजा

‘बंदे मातरम्’ में छपे तीखे लेखों के लिए अरविंद घोष को गिरफ्तार किया गया, पर सरकार के पास यह साबित करने का कोई ठोस प्रमाण नहीं था कि संपादक वही हैं। तब सरकार ने बिपिन चंद्र पाल को अदालत में गवाही के लिए बुलाया, क्योंकि उनके बारे में मशहूर था कि वे सच के अलावा कुछ नहीं कहते। अदालत में पूछे जाने पर उन्होंने गवाही देने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि वे विदेशी सरकार के सामने गवाही नहीं देंगे। नतीजा यह हुआ कि सबूतों के अभाव में अरविंद घोष रिहा हो गए, जबकि गवाही से इनकार करने पर बिपिन चंद्र पाल को छह महीने की सजा मिली।

खुदीराम बोस और क्रांतिकारी धारा का जन्म

दमन इतना बढ़ा कि युवाओं का एक हिस्सा शांतिपूर्ण रास्ते से भरोसा खो बैठा और गुप्त क्रांतिकारी संगठनों की ओर मुड़ गया। बंगाल में अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे संगठन इसी दौर में सक्रिय हुए।

उन दिनों वंदे मातरम् कहना ही अपराध माना जाता था। मेदिनीपुर की एक कृषि प्रदर्शनी में एक किशोर पुस्तकें लेकर नारे लगा रहा था कि अंग्रेजों के काले कारनामे इस पुस्तक में पढ़िए और वंदे मातरम् बोलिए। यह किशोर खुदीराम बोस था। उसके अध्यापक ने समझाया कि वंदे मातरम् कहना विद्रोह है, तो उसने जवाब दिया कि फिर वह विद्रोही ही सही। पुलिस ने उसे पकड़कर बुरी तरह पीटा, मुकदमा चला, पर सबूत न होने से वह छूट गया।

आगे चलकर 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को निशाना बनाकर बम फेंका, पर उस गाड़ी में दो अंग्रेज महिलाएँ मारी गईं। प्रफुल्ल चाकी ने पकड़े जाने से पहले स्वयं को गोली मार ली और खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को मात्र 18 वर्ष की आयु में फाँसी दे दी गई। वे भारत के सबसे कम उम्र के शहीदों में गिने जाते हैं। इसी सिलसिले में अलीपुर बम कांड चला, जिसमें अरविंद घोष और बारींद्र कुमार घोष सहित कई क्रांतिकारी अभियुक्त बनाए गए।

बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी

खुदीराम बोस के मुकदमे के बाद तिलक ने ‘केसरी’ में 12 मई और 9 जून 1908 को दो तीखे लेख लिखे, जिनमें उन्होंने तर्क दिया कि यदि सरकार अन्याय करेगी तो जनता की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। सरकार ने इन्हें राजद्रोह माना और उनके विरुद्ध दूसरा राजद्रोह मुकदमा चलाया। जून 1908 में बंबई से उनकी गिरफ्तारी हुई और 22 जुलाई 1908 को न्यायाधीश दिनशॉ डी. दावर ने उन्हें छह वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई। उन्हें बर्मा की मांडले जेल भेजा गया, जहाँ वे 1908 से 1914 तक रहे और वहीं उन्होंने ‘गीता रहस्य’ लिखा।

कई परीक्षा पुस्तकों में तिलक की गिरफ्तारी की तिथि 3 जुलाई 1908 दी जाती है, जबकि अदालती अभिलेखों में यह 24 जून 1908 दर्ज है। सजा की तिथि 22 जुलाई 1908 पर सभी स्रोत एकमत हैं।

आंदोलन के कमजोर पड़ने के कारण

1905 में कोलकाता की सड़कों पर दिखा स्वदेशी आंदोलन का जोश 1908 आते-आते अचानक नहीं बिखरा, बल्कि इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे थे।

कठोर सरकारी दमन और नेतृत्व का संकट

  • खुदीराम बोस को फाँसी और बाल गंगाधर तिलक को छह साल के लिए मांडले भेजे जाने से यह साफ संदेश गया कि आंदोलनकारियों को जेल या निर्वासन ही मिलेगा।
  • अरविंद घोष अलीपुर बम कांड में फँस गए और अश्विनी कुमार दत्त को देश निकाला दे दिया गया, जबकि सैकड़ों छोटे कार्यकर्ता बिना मुकदमे के महीनों जेल में रहे।
  • सभाओं पर कड़े प्रतिबंध और प्रेस पर सेंसरशिप के कारण आंदोलन ने अपने सबसे अनुभवी चेहरे खो दिए, जिससे बचे हुए नेता भी कोई कदम उठाने से पहले हिचकिचाने लगे।

सामाजिक दरार और मुस्लिम लीग का उदय

  • पूर्वी बंगाल के मुस्लिम किसान वर्ग को नए प्रांत में अपना फायदा दिख रहा था, जिससे वे शुरुआत से ही इस आंदोलन से काफी हद तक कटे रहे।
  • 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना और नवाब सलीमुल्लाह जैसे प्रभावशाली नेताओं के ब्रिटिश सरकार के करीब जाने से यह स्वाभाविक दूरी एक संगठित राजनीतिक विभाजन में बदल गई।
  • मुसलमानों के नाम पर एक अलग राजनीतिक मंच खड़ा हो गया जो सीधे सरकार का समर्थन कर रहा था, जिसने आगे चलकर पृथक निर्वाचन मंडल और 1947 के विभाजन के बीज बोए।

सूरत अधिवेशन (1907) में कांग्रेस का विभाजन

  • दिसंबर 1907 के सूरत अधिवेशन में नरमपंथी और गरमपंथी नेताओं के बीच मतभेद इतने हिंसक हो गए कि अधिवेशन बीच में ही टूट गया और यह आंदोलन के लिए आत्मघाती साबित हुआ।
  • स्वदेशी और बहिष्कार के सबसे बड़े पैरोकार—तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल—जैसे गरमपंथी नेता कांग्रेस की मुख्यधारा से बाहर हो गए।
  • कांग्रेस पर नरमपंथियों का नियंत्रण तो रहा, लेकिन उनकी याचिका और प्रार्थना की पुरानी शैली उस उग्र जनांदोलन को आगे नहीं बढ़ा सकी, जिससे आंदोलन का सबसे ऊर्जावान हिस्सा अपने ही संगठन से कट गया।

दीर्घकालिक रणनीति और केंद्रीय संगठन का अभाव

  • गरमपंथी नेताओं के जेल जाने, निर्वासित होने या हाशिये पर चले जाने के बाद आंदोलन को आगे ले जाने वाली कोई स्पष्ट और दीर्घकालिक रणनीति नहीं बची।
  • स्वदेशी और बहिष्कार जैसे तरीकों को बरसों तक चलाने के लिए जिस मजबूत संगठन, निरंतर फंडिंग और नेतृत्व-श्रृंखला की आवश्यकता थी, वह कभी तैयार नहीं हो पाई।
  • दिशा दिखाने वाले केंद्रीय नेतृत्व के अभाव में छोटे-छोटे स्थानीय समूह अपने स्तर पर ही लड़ते रहे, जिससे आंदोलन धीरे-धीरे बिखर गया।

इन सारी कमजोरियों और बिखराव के बावजूद, ब्रिटिश सरकार खुद यह समझ चुकी थी कि बंगाल विभाजन एक भारी भूल साबित हो रहा है। आंदोलन का बाहरी स्वरूप भले ही थम गया हो, पर इसके द्वारा पूरे देश में पैदा किया गया असंतोष कहीं खत्म नहीं हुआ था और इसी असंतोष ने आगे चलकर अंग्रेजी हुकूमत को झुकने पर मजबूर कर दिया।

बंगाल विभाजन कब और किसने रद्द किया?

बंगाल विभाजन 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम की घोषणा से रद्द हुआ। उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय थे। लगातार छह वर्षों के विरोध और आंदोलन के दबाव के आगे अंततः ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा।

रद्द होने के बाद जो पुनर्गठन हुआ वह ध्यान देने योग्य है, क्योंकि परीक्षा में यही हिस्सा पूछा जाता है। बंगाल को अब धर्म के बजाय भाषा के आधार पर एक किया गया, यानी सभी बंगाली भाषी क्षेत्र एक प्रांत में आ गए। बिहार और उड़ीसा को अलग करके एक नया प्रांत बनाया गया, और असम को अलग चीफ कमिश्नर प्रांत बना दिया गया। इसी घोषणा में यह भी कहा गया कि भारत की राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली ले जाई जाएगी।

राजधानी बदलना एक सोचा-समझा कदम था। कोलकाता राष्ट्रवादी राजनीति का केंद्र बन चुका था, इसलिए सरकार वहाँ से दूर जाना चाहती थी। साथ ही दिल्ली मुगल सत्ता की पुरानी राजधानी थी, जिससे ब्रिटिश शासन को ऐतिहासिक वैधता का दिखावा मिलता था।

बंगाल विभाजन के परिणाम और दीर्घकालिक प्रभाव

बंगाल विभाजन का रद्द होना राष्ट्रवादियों की एक बड़ी नैतिक जीत थी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी और कई गहरे प्रभाव छोड़े:

  • संघर्ष के नए तरीकों का जन्म: याचिका और प्रार्थना की पुरानी राजनीति की सीमाएं उजागर हो गईं। इसके स्थान पर बहिष्कार, निष्क्रिय प्रतिरोध और उग्र जन आंदोलन जैसे नए हथियार सामने आए, जिन्हें आगे चलकर महात्मा गांधी ने अपने आंदोलनों का मुख्य आधार बनाया।
  • राष्ट्रवाद के सामाजिक दायरे का विस्तार: यह पहला मौका था जब छात्र, महिलाएँ और शहरी मध्यम वर्ग बड़ी संख्या में घरों से निकलकर राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल हुए, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को एक नई सामाजिक ताकत मिली।
  • आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय गौरव (स्वदेशी भावना): स्वदेशी उद्योगों और उद्यमों को भारी बल मिला। विदेशी शिक्षा का बहिष्कार कर राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की स्थापना की गई, जिसका भारतीय शिक्षा, उद्योग और संस्कृति पर दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • साम्प्रदायिक राजनीति की मजबूती: यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर और दूरगामी परिणाम था। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना और 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों (पृथक निर्वाचन मंडल) ने हिंदू-मुस्लिम एकता में जो संगठित दरार पैदा की, वह अंततः 1947 में देश के विभाजन तक गई।
  • सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत: शांतिपूर्ण और संवैधानिक विरोध की सीमाओं से निराश युवाओं के कारण बंगाल में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों ने मजबूत जड़ें जमाईं, जिसकी कड़ियाँ आगे चलकर पूरे देश में फैल गईं।

बंगाल विभाजन: महत्वपूर्ण तिथियाँ एक साथ

तिथिघटना
दिसंबर 1903विभाजन का पहला प्रस्ताव सामने आया
19 जुलाई 1905विभाजन की आधिकारिक घोषणा
7 अगस्त 1905टाउन हॉल, कोलकाता — स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन की घोषणा
10 अक्टूबर 1905कार्लाइल सर्कुलर जारी
16 अक्टूबर 1905विभाजन लागू, शोक दिवस और राखी दिवस
8 नवंबर 1905रंगपुर नेशनल स्कूल की स्थापना
11 मार्च 1906राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन
अप्रैल 1906बरिसाल सम्मेलन और पुलिस दमन
15 अगस्त 1906बंगाल नेशनल कॉलेज शुरू, प्राचार्य अरविंद घोष
दिसंबर 1906ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना; कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज का लक्ष्य
1907सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन
11 अगस्त 1908खुदीराम बोस को फाँसी
1909मॉर्ले-मिंटो सुधार, पृथक निर्वाचन मंडल
12 दिसंबर 1911दिल्ली दरबार में विभाजन रद्द, राजधानी दिल्ली स्थानांतरित

बंगाल विभाजन 1905: क्विक रिवीजन माइंड मैप

परीक्षा की तैयारी आसान बनाने के लिए हमने ‘बंगाल विभाजन 1905’ का यह विस्तृत माइंड मैप तैयार किया है। एक ही चार्ट में विभाजन के कारण, प्रमुख नेता और स्वदेशी आंदोलन का पूरा रिवीजन हो जाएगा।

बंगाल विभाजन 1905 का माइंड मैप और क्विक रिवीजन नोट्स
बंगाल विभाजन (1905) — क्विक रिवीजन माइंड मैप

बंगाल विभाजन 1905 रिवीजन नोट्स PDF डाउनलोड करें

निष्कर्ष: एक विफल होकर भी सफल आंदोलन

स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन अपने तात्कालिक लक्ष्य तुरंत हासिल नहीं कर सका और 1911 तक इसकी गति धीमी पड़ चुकी थी। फिर भी दूरगामी अर्थों में यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बड़ी सफलता थी। इसने पहली बार दिखाया कि जनता को सड़क पर उतारकर सत्ता को पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है, और यही सीख आगे के हर बड़े आंदोलन की नींव बनी।

गांधीजी ने भी बाद में यही बात रखी कि बंगाल विभाजन के बाद लोगों ने समझ लिया कि याचिका के पीछे जनशक्ति खड़ी करनी होगी। संक्षेप में, बंगाल विभाजन अंग्रेजों की एक भूल थी जिसने सोए हुए भारत को जगा दिया और स्वतंत्रता की लड़ाई को ऐसे रास्ते पर डाल दिया जहाँ से वापसी संभव नहीं थी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

बंगाल विभाजन कब हुआ था?

बंगाल विभाजन की आधिकारिक घोषणा 19 जुलाई 1905 को हुई और यह 16 अक्टूबर 1905 को लागू किया गया। इसे लॉर्ड कर्जन ने लागू किया था, जो उस समय भारत के वायसराय थे।

बंगाल विभाजन किसने किया था?

बंगाल विभाजन तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने किया था। इसकी योजना 1903 में बनी और गृह सचिव हर्बर्ट होप रिजले ने इसका प्रशासनिक आधार तैयार किया था।

बंगाल विभाजन कब और किसने रद्द किया?

बंगाल विभाजन 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम की घोषणा से रद्द हुआ। उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय थे। इसी घोषणा में राजधानी कोलकाता से दिल्ली ले जाने की बात भी कही गई।

बंगाल विभाजन के फलस्वरूप कौन सा आंदोलन शुरू हुआ?

बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन शुरू हुआ। इसकी औपचारिक घोषणा 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में हुई, इसलिए 7 अगस्त को स्वदेशी आंदोलन का प्रारंभ दिवस माना जाता है।

बंगाल विभाजन के मुख्य कारण क्या थे?

अंग्रेजों ने कारण प्रशासनिक सुविधा बताया, क्योंकि बंगाल की आबादी लगभग 7.8 करोड़ थी। असली कारण राजनीतिक थे — बंगाल राष्ट्रवाद का केंद्र था, इसलिए उसे कमजोर करना, और हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच धार्मिक व भाषाई आधार पर फूट डालना।

विभाजन के बाद बंगाल किन दो प्रांतों में बँटा?

पहला प्रांत था पूर्वी बंगाल और असम, जिसकी राजधानी ढाका थी और जो मुस्लिम बहुल था। दूसरा था शेष बंगाल, जिसमें पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा शामिल थे और जिसकी राजधानी कोलकाता रही।

कार्लाइल सर्कुलर क्या था?

कार्लाइल सर्कुलर 10 अक्टूबर 1905 को बंगाल के मुख्य सचिव आर. डब्ल्यू. कार्लाइल ने जारी किया था। इसमें छात्रों के स्वदेशी सभाओं में भाग लेने और वंदे मातरम् गाने पर रोक थी। इसके विरोध में सचींद्र प्रसाद बोस ने एंटी-सर्कुलर सोसाइटी बनाई।

बंगाल विभाजन के समय भारत का वायसराय कौन था?

विभाजन के समय वायसराय लॉर्ड कर्जन थे, जिनका कार्यकाल 1899 से 1905 तक रहा। विभाजन लागू होने से कुछ ही समय पहले, अगस्त 1905 में, कर्जन ने किचनर से मतभेद के कारण इस्तीफा दे दिया था।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न (Previous Year Questions)

NDA (I) 2017

1. 1904 में बंगाल विभाजन के बारे में किस उपनिवेशी प्रशासक ने यह घोषणा की — “संयुक्त बंगाल एक शक्ति है, विभाजित बंगाल विभिन्न रास्तों की ओर खिंचेगा”?

यह पंक्ति गृह सचिव हर्बर्ट होप रिजले ने 1904 में कर्जन को लिखे एक पत्र में कही थी, जिसमें विभाजन के पीछे की असली राजनीतिक मंशा साफ झलकती है।
BPSC (Pre) 2017-18

2. बंगाल विभाजन की घोषणा कब की गई?

सरकारी प्रस्ताव 19 जुलाई 1905 को प्रकाशित हुआ था, जबकि विभाजन इसके तीन महीने बाद 16 अक्टूबर 1905 को लागू हुआ।
UPPCS (Pre) 1994, BPSC (Pre) 2001/2002

3. बंगाल का विभाजन (लागू) कब हुआ?

16 अक्टूबर 1905 को विभाजन प्रभावी हुआ और इसी दिन को पूरे बंगाल में शोक दिवस तथा राखी दिवस के रूप में मनाया गया।
UPPCS (Pre) 2011

4. निम्नलिखित में से किसने बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में आंदोलन का नेतृत्व किया था?

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आंदोलन के सबसे शुरुआती और प्रमुख नेताओं में थे, जिन्होंने प्रेस अभियान और जनसभाओं से इसका नेतृत्व किया।
UPPCS (Pre) 2002/2005, Uttarakhand PCS 2006

5. निम्नलिखित में से किस आंदोलन के दौरान “वंदे मातरम्” को पहली बार नारे के रूप में अपनाया गया?

वंदे मातरम् गीत उपन्यास “आनंदमठ” से लिया गया था, पर राजनीतिक नारे के रूप में इसका प्रयोग बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में सबसे पहले हुआ।
Himachal Pradesh PCS (Pre) 2011

6. किस कांग्रेस अधिवेशन ने 1905 में बंगाल के स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया?

बनारस अधिवेशन 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में हुआ था, जहाँ बंगाल के संदर्भ में स्वदेशी-बहिष्कार को समर्थन दिया गया।
UPPCS (Pre) Opt. History 2002, 2007

7. किस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्वदेशी के प्रस्ताव को अपनाया?

1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में स्वराज के साथ-साथ स्वदेशी का प्रस्ताव भी औपचारिक रूप से पारित किया गया था।
UPPCS (Pre) Opt. History 2002

8. स्वदेशी आंदोलन की विचारधारा की वकालत सबसे पहले किसने की थी?

बंगाल के भोलानाथ चंद्र को स्वदेशी की विचारधारा प्रस्तुत करने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है, यह विभाजन से भी पहले की बात है।
UP Lower (Pre) 2008

9. मद्रास में स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?

वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने मद्रास में आंदोलन का नेतृत्व किया और स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी भी स्थापित की, जिससे उन्हें “कप्पलोट्टिय तमिळन” कहा गया।
NDA (II) 2019

10. स्वदेशी आंदोलन के दौरान कलकत्ता में शुरू हुए नेशनल कॉलेज के प्राचार्य कौन थे?

बंगाल नेशनल कॉलेज 15 अगस्त 1906 को शुरू हुआ, जिसके पहले प्राचार्य अरविंद घोष और मानद अधीक्षक सतीश चंद्र मुखर्जी थे।
Uttarakhand PCS (Pre) 2002-03

11. स्वराज को राष्ट्रीय मांग के रूप में सबसे पहले किसने रखा?

दादाभाई नौरोजी ने 1906 के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए स्वराज की मांग को औपचारिक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में रखा।
UP Lower (Pre) 2004, UPPCS (Mains) G.S. I 2011

12. बंगाल में ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का सुझाव सबसे पहले किसने दिया था?

कृष्ण कुमार मित्र ने अपनी पत्रिका “संजीवनी” के 13 जुलाई 1905 के अंक में सबसे पहले यह सुझाव दिया था, जिसे बाद में 7 अगस्त 1905 की सभा में औपचारिक रूप से अपनाया गया।
IAS (Pre) 2010

13. 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने चार संकल्प पारित किए थे। इनमें से कौन-सा संकल्प उन चारों में नहीं था?

1906 में पारित चार संकल्प थे — बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी और स्वराज। विभाजन तो 1911 में ही रद्द हुआ, इसलिए यह 1906 के प्रस्तावों में नहीं था।
IAS (Pre) I Paper G.S. 2015

14. किस आंदोलन के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप “नरम दल” और “गरम दल” का उदय हुआ?

स्वदेशी आंदोलन को आगे बढ़ाने के तरीकों को लेकर मतभेद इतने बढ़े कि 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो हिस्सों में बँट गई।
NDA (I) 2008

15. निम्नलिखित में से किसने बंगाल विभाजन का निराकरण (समाप्ति) किया?

1911 में जब विभाजन रद्द हुआ, तब भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय थे — उन्हीं के कार्यकाल में दिल्ली दरबार का आयोजन हुआ था।
कठिन · CAPF (AC) Paper-I 2016

16. 1905 में बंगाल में हुए स्वदेशी आंदोलन के बारे में कौन-से कथन सही हैं?
1. यह “समितियों” के संगठन से जन-गतिशीलता के लिए जाना गया।
2. यह श्रमिक हड़तालों से जन-संघटन के लिए जाना गया।
3. इसने आत्मशक्ति के रचनात्मक कार्यक्रम का समर्थन किया।
4. शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय विद्यालय स्थापित किए गए।

आंदोलन ने स्थानीय समितियाँ बनाईं, मजदूर हड़तालें कराईं, आत्मशक्ति व स्वावलंबन का प्रचार किया, और राष्ट्रीय शिक्षा परिषद जैसी संस्थाएँ भी खड़ी कीं — चारों कथन सही हैं, यही इसे कठिन बनाता है क्योंकि हर एक तथ्यात्मक रूप से जाँचना पड़ता है।
कठिन · CDS (II) 2013

17. बंगाल में स्वदेशी और क्रांतिकारी आंदोलनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

वास्तव में पूर्वी बंगाल-असम की सरकार ने क्रांतिकारियों का दमन ही किया, सहानुभूति नहीं दिखाई — बाकी तीनों कथन इतिहास से मेल खाते सही कथन हैं, इसलिए ग़लत कथन पहचानना ध्यान माँगता है।
कठिन · IAS (Pre) 2002

18. स्वदेशी की भावना से ओत-प्रोत भारत के चरमपंथी राष्ट्रवादी आंदोलन के संदर्भ में कौन-सा कथन सही नहीं है?

बारीसाल के मुस्लिम किसानों के आंदोलन का नेतृत्व लियाकत हुसैन ने नहीं, बल्कि बारीसाल सम्मेलन (1906) की अध्यक्षता करने वाले अब्दुल रसूल ने किया था — दो मिलते-जुलते नामों (लियाकत हुसैन बनाम अब्दुल रसूल) में भ्रम पैदा करने के लिए यह प्रश्न कठिन है।
कठिन · IAS (Pre) 1998

19. भारतीय मुसलमान सामान्यतः उग्रवादी आंदोलन की ओर आकर्षित नहीं हुए, इसका मुख्य कारण था —

गणपति-शिवाजी उत्सव जैसे कार्यक्रमों में हिंदू प्रतीकों और अतीत का अत्यधिक उभार मुसलमानों को आंदोलन से दूर करने का बड़ा कारण बना — यह विकल्प (a) जैसे प्रचलित पर कम सटीक जवाबों से अलग पहचानना पड़ता है।
कठिन · Assertion-Reason, IAS (Pre) 1998

20. कथन (A): 1905 में बंगाल के विभाजन से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नरमपंथियों की भूमिका समाप्त हो गई।
कारण (R): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत अधिवेशन ने गरमपंथियों को नरमपंथियों से पृथक कर दिया।

सूरत अधिवेशन (1907) में कांग्रेस टूटी यह सच है, इसलिए कारण (R) सही है। पर नरमपंथियों की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई — 1916 के लखनऊ अधिवेशन में दोनों गुट फिर एक हो गए, इसलिए कथन (A) गलत है। यह प्रकार सबसे कठिन माना जाता है क्योंकि दोनों वाक्य अलग-अलग जाँचने पड़ते हैं।

स्रोत एवं संदर्भ

इस लेख के तथ्य निम्नलिखित स्रोतों से जाँचे गए हैं — भारत सरकार का राष्ट्रीय गीत संबंधी आधिकारिक पृष्ठ, बांग्लापीडिया का 'Partition of Bengal, 1905' तथा 'National Council of Education' प्रविष्टियाँ, राष्ट्रीय शिक्षा परिषद बंगाल का आधिकारिक इतिहास, बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड का कंपनी इतिहास, तथा बिपन चंद्रा की 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' एवं NCERT की आधुनिक भारत की पाठ्यपुस्तकें।

Nitin Tiwari
✍️ लेखक

Nitin Tiwari

नितिन तिवारी GKGSNotes.com के संस्थापक और मुख्य लेखक हैं। उन्होंने गणित में B.Sc. और भूगोल में M.A. की डिग्री प्राप्त की है तथा D.El.Ed (2017 बैच) भी किया है। इसके अलावा उन्हें 5 वर्षों का शिक्षण अनुभव भी है, जिससे वे छात्रों की जरूरतों और परीक्षा की चुनौतियों को गहराई से समझते हैं। उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाले नितिन जी को भूगोल, इतिहास और सामान्य ज्ञान विषयों में गहरी रुचि है। उनका लक्ष्य है कि हिंदी माध्यम के छात्रों को UPSC, UPPSC, SSC, UP Police जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उच्च गुणवत्ता की अध्ययन सामग्री बिल्कुल निःशुल्क मिले।

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