भारतीय संवैधानिक विकास के क्रम में इंडियन काउंसिल एक्ट 1892, जिसे हिंदी में भारतीय परिषद अधिनियम 1892 कहा जाता है, एक बेहद महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी पड़ाव है। पिछले लेख में हमने इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 का गहराई से विश्लेषण किया था, जहां हमने देखा था कि अंग्रेजों ने कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीयों को शामिल तो किया, लेकिन वह भागीदारी पूरी तरह दिखावटी थी। 1861 की वह विधान परिषद एक ‘बिना दांत के शेर’ जैसी थी — जिसमें बैठे भारतीय न सरकार से सवाल पूछ सकते थे, न देश के बजट पर एक शब्द बोल सकते थे।
अगले तीस वर्षों में भारत बहुत बदल गया। पढ़े-लिखे भारतीयों में राजनीतिक चेतना जागी, 1885 में कांग्रेस बनी, और एक जवाबदेह सरकार की मांग संगठित आवाज बन गई। इसी बढ़ते दबाव का सीधा परिणाम था 20 जून 1892 को शाही स्वीकृति पाने वाला यह अधिनियम, जो 3 फरवरी 1893 से भारत में लागू हुआ।
UPSC, UPPSC, BPSC और अन्य राज्य PCS परीक्षाओं के लिए यह एक्ट इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक भारत में ‘चुनाव’ और ‘प्रतिनिधित्व’ के बीज इसी अधिनियम के जरिए बोए गए थे। आइए समझते हैं कि किन परिस्थितियों ने ब्रिटिश सरकार को यह एक्ट लाने पर मजबूर किया, और इसने भारत के प्रशासनिक ढांचे को कैसे बदला।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इस एक्ट की जरूरत क्यों पड़ी?
इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 रातों-रात ब्रिटिश संसद के दिमाग में आया कोई खयाल नहीं था। भारतीय परिषद अधिनियम 1892 दरअसल भारत में हो रहे तीव्र राजनीतिक बदलावों की एक प्रतिक्रिया थी। 1861 से 1892 के बीच के तीस वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं, जिन्होंने इस नए एक्ट की रूपरेखा तय कर दी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)
सबसे बड़ी घटना 1885 में ए.ओ. ह्यूम के प्रयासों से ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना थी। कांग्रेस के गठन ने भारत के पढ़े-लिखे और राष्ट्रवादी नेताओं को एक साझा मंच दे दिया। दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे दिग्गज अब एक जगह इकट्ठा होने लगे। अब तक जो मांगें छिटपुट तरीके से उठ रही थीं, वे एक राष्ट्रीय आवाज बन गईं।
कांग्रेस की चार प्रमुख मांगें
कांग्रेस ने अपने 1885 और 1889 के अधिवेशनों में प्रस्ताव पारित करके स्पष्ट कर दिया कि 1861 के सुधार भारतीयों के लिए बिल्कुल नाकाफी हैं। उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन थे। नरमपंथी नेताओं ने विधायिका में सुधार के लिए मुख्यतः चार मांगें रखीं:
- सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए — केंद्रीय विधायिका में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या, जो उस समय न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 थी, बढ़ाई जाए ताकि देश के ज्यादा हिस्सों का प्रतिनिधित्व हो।
- चुनाव कराए जाएं — अतिरिक्त सदस्यों को वायसराय की मर्जी से ‘मनोनीत’ करने के बजाय ‘निर्वाचित’ करके भेजा जाए।
- बजट पर चर्चा का अधिकार मिले — विधान परिषद में देश के वित्तीय मामलों पर बहस की अनुमति दी जाए, जो 1861 के एक्ट में पूरी तरह प्रतिबंधित थी।
- अन्य प्रशासनिक मांगें — सैन्य खर्च कम किया जाए, और भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा केवल इंग्लैंड में नहीं, बल्कि इंग्लैंड और भारत में एक साथ आयोजित हो।
एक्ट बनने तक का सफर
इन मांगों को टालना अब आसान नहीं रह गया था। वर्ष 1888 में वायसराय लॉर्ड डफरिन ने विधान परिषदों के विस्तार पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की। उसी की सिफारिशों के आधार पर भारत सचिव लॉर्ड क्रॉस (Viscount Cross) ने 9 फरवरी 1892 को यह विधेयक हाउस ऑफ लॉर्ड्स में पेश किया। 20 जून 1892 को इसे शाही स्वीकृति मिली और 3 फरवरी 1893 से यह भारत में प्रभावी हो गया।
ध्यान देने वाली बात
ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस की मांगें ‘मान’ नहीं लीं — उसने उन्हें बहुत सावधानी से छांटा। जो मांग सत्ता के लिए खतरा नहीं थी (बजट पर सिर्फ चर्चा, सिफारिश पर मनोनयन), उसे मान लिया गया। जो मांग असली सत्ता छीनती थी (प्रत्यक्ष चुनाव, बजट पर वोटिंग), उसे साफ ठुकरा दिया गया। यही 1892 के एक्ट को समझने की कुंजी है।

इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 (भारतीय परिषद अधिनियम) के प्रमुख प्रावधान
इस अधिनियम का पूरा जोर विधायिका पर था। लंदन का नियंत्रण और भारत की कार्यपालिका, दोनों लगभग अछूते रहे। नीचे सभी प्रमुख प्रावधानों को क्रमवार समझते हैं।
भारत सरकार पर नियंत्रण: लंदन की स्थिति यथावत
शासन के सर्वोच्च स्तर पर इस एक्ट ने कोई ढांचागत बदलाव नहीं किया। भारतीय प्रशासन का पूरा नियंत्रण अब भी लंदन में बैठे भारत सचिव के हाथों में सुरक्षित रहा, जो अपनी 15 सदस्यीय भारत परिषद और भारत में मौजूद अपने प्रतिनिधि वायसराय के जरिए शासन चला रहा था। 1858 के भारत सरकार अधिनियम से चला आ रहा यह शीर्ष ढांचा 1892 में भी जस का तस बना रहा।
कार्यपालिका (Executive Council): लगभग कोई बदलाव नहीं
कार्यपालिका के मोर्चे पर भी यह एक्ट लगभग खामोश रहा। 1861 के एक्ट में कार्यकारी परिषद के सदस्य 5 कर दिए गए थे, और 1874 में लोक निर्माण विभाग के लिए छठा सदस्य जुड़ा था — यह 6 सदस्यीय परिषद और उसका ‘पोर्टफोलियो सिस्टम’ वैसा ही चलता रहा। आपातकाल में वायसराय की अध्यादेश जारी करने की शक्ति भी पूर्ववत बनी रही।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट
कार्यपालिका में इस एक्ट ने एक छोटा पर उल्लेखनीय बदलाव जरूर किया — विधि सदस्य को पहली बार कार्यकारी परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया गया। इससे पहले उसकी हैसियत कुछ मामलों में सीमित थी।
अंग्रेजों की नीति साफ थी — विधायिका में भारतीयों को थोड़ी जगह दे दो ताकि गुस्सा शांत हो, लेकिन कार्यपालिका, जहां असली फैसले होते हैं, वहां किसी भारतीय की एंट्री नहीं।
केंद्रीय विधायिका: कांग्रेस की मांगों का आंशिक असर

एक्ट का असली और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यहीं था। यहीं कांग्रेस की पहली राजनीतिक जीत की झलक दिखाई देती है।
सदस्यों की संख्या में वृद्धि
कांग्रेस की पहली मांग मानते हुए केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई:
- 1861 के एक्ट में: न्यूनतम 6, अधिकतम 12
- 1892 के एक्ट में: न्यूनतम 10, अधिकतम 16
व्यवहार में ब्रिटिश सरकार ने इसे शुरुआत से ही अधिकतम सीमा यानी 16 सदस्यों पर तय कर दिया।
सदस्यों का बँटवारा और ‘बहुमत का ब्रिटिश खेल’
इन 16 अतिरिक्त सदस्यों को इस तरह बांटा गया:
- 6 आधिकारिक सदस्य (Official Members) — भारतीय सिविल सेवा (ICS) या सैन्य सेवा में कार्यरत उच्च अधिकारी
- 10 गैर-आधिकारिक सदस्य (Non-Official Members) — जो सरकारी सेवा में नहीं थे; भारतीय इसी श्रेणी से आते थे
ऊपर से देखने पर लगता है कि 10 बनाम 6 के हिसाब से गैर-आधिकारिक सदस्यों का बहुमत हो गया होगा। लेकिन असली गणित कुछ और था। परिषद में इन 16 के अलावा 9 पदेन (ex-officio) सदस्य भी बैठते थे:
- गवर्नर जनरल (वायसराय) — स्वयं
- कार्यकारी परिषद के 6 सदस्य
- प्रधान सेनापति (Commander-in-Chief)
- जिस प्रांत में परिषद की बैठक हो रही हो, उसका प्रमुख (लेफ्टिनेंट गवर्नर)
यानी वोटिंग के समय गणित बनता था — 9 पदेन + 6 आधिकारिक अतिरिक्त = 15 सरकारी पक्ष, बनाम 10 गैर-आधिकारिक। इस तरह सदस्य संख्या बढ़ाने के बावजूद बहुमत हमेशा ब्रिटिश अधिकारियों का ही सुरक्षित रहा।
कांग्रेस चाहती थी कि सदस्य चुनकर आएं। ब्रिटिश सरकार प्रत्यक्ष चुनाव के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी, क्योंकि डर था कि इससे असली राष्ट्रवादी नेता परिषद में पहुंच जाएंगे। इसलिए उसने एक कूटनीतिक बीच का रास्ता निकाला — ‘सिफारिश पर मनोनयन’।
जो 10 गैर-आधिकारिक सदस्य थे, वे इस तरह परिषद में पहुंचते थे:
| कैसे आते थे | कितने सदस्य |
|---|---|
| सीधे वायसराय द्वारा मनोनीत | 5 |
| चार प्रांतीय विधान परिषदों (बंगाल, बॉम्बे, मद्रास और उत्तर-पश्चिमी प्रांत) की सिफारिश पर | 4 |
| बंगाल चेंबर ऑफ कॉमर्स (कलकत्ता) की सिफारिश पर | 1 |
अब सभी सदस्य केवल वायसराय की मर्जी से नहीं आ रहे थे — कुछ सदस्य दूसरी संस्थाओं की सिफारिश से आ रहे थे। यही प्रक्रिया भारत में ‘चुनाव के सिद्धांत’ की ओर पहला ठोस कदम मानी जाती है।
शब्दों का खेल
एक्ट में ‘चुनाव’ (Election) शब्द का प्रयोग एक बार भी नहीं किया गया। जो सदस्य वास्तव में चुनकर आते थे, उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘मनोनीत’ (Nominated) कहा जाता था, और चुनने की प्रक्रिया को ‘सिफारिश’। सरकार का कानूनी रुख यह था कि अंतिम नियुक्ति का अधिकार अब भी पूरी तरह वायसराय का है — संस्थाएं (विश्वविद्यालय, नगर पालिका आदि) सिर्फ किसी नाम की सिफारिश भेज रही हैं, वायसराय पर उसे मानने की कोई बाध्यता नहीं है।
इसी तकनीकी दलील के सहारे व्यवहार में यह लगभग चुनाव जैसा ही था, पर कानूनी कागज़ों में इसे कभी ‘चुनाव’ नहीं कहा गया। परीक्षा में अक्सर यही पूछा जाता है — 1892 के एक्ट ने प्रत्यक्ष चुनाव शुरू नहीं किया, और ‘चुनाव’ शब्द एक्ट में था ही नहीं।
विधायिका की शक्तियों में ऐतिहासिक वृद्धि
यही वह क्षेत्र था जहां भारतीयों को सबसे बड़ी वैधानिक जीत मिली।
1. बजट पर चर्चा का अधिकार
1861 के एक्ट में वित्तीय मामलों पर बात करने की सख्त मनाही थी। 1892 के एक्ट ने यह ऐतिहासिक अधिकार दिया कि अब सदस्य हर साल पेश होने वाली वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट (Budget) पर बहस कर सकते हैं।
- पाबंदी: चर्चा की छूट थी, लेकिन वोटिंग का अधिकार नहीं। आप सरकार की आलोचना कर सकते थे, कमियां गिना सकते थे — पर बजट को बदलने या गिराने के लिए वोट नहीं डाल सकते थे।
2. प्रश्न पूछने का अधिकार
अतिरिक्त सदस्यों को अब कार्यपालिका से जनहित के मुद्दों पर सवाल पूछने का अधिकार मिल गया। लेकिन इस पर तीन कड़ी शर्तें थीं:
- 6 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य था, ताकि अधिकारी अपना जवाब तैयार कर सके।
- पूरक प्रश्न (Supplementary Question) नहीं पूछा जा सकता था। जवाब चाहे कितना भी गोलमोल हो, वही अंतिम माना जाता था।
- आंतरिक मामलों से जुड़े प्रश्नों के लिए गवर्नर जनरल की पूर्व अनुमति आवश्यक थी।
प्रांतीय विधायिका: प्रतिनिधित्व के सिद्धांत की शुरुआत
केंद्रीय स्तर के साथ-साथ प्रांतीय स्तर पर भी इस एक्ट ने महत्वपूर्ण सुधार किए।
सदस्यों की संख्या में वृद्धि: हर प्रांतीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई:
| प्रांत | अतिरिक्त सदस्यों की अधिकतम संख्या |
|---|---|
| बंगाल | 20 |
| मद्रास | 20 |
| उत्तर-पश्चिमी प्रांत व अवध | 15 |
| बॉम्बे | 8 |
प्रतिनिधित्व का नया सिद्धांत: प्रांतीय परिषदों में गैर-आधिकारिक सदस्यों को अब विभिन्न स्थानीय संस्थाओं की सिफारिश पर मनोनीत किया जाने लगा। ये संस्थाएं थीं:
- विश्वविद्यालय
- जिला बोर्ड
- नगर पालिकाएं
- बड़े जमींदार
- व्यापारिक संघ और चेंबर ऑफ कॉमर्स
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि अलग-अलग वर्गों और संस्थानों के प्रतिनिधि एक अप्रत्यक्ष प्रक्रिया के जरिए अपनी-अपनी प्रांतीय विधायिका में पहुंचने लगे। भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का यह बहुत ही शुरुआती, पर असली बीज था।
🔗 संबंधित लेख
प्रांतीय विधान परिषदों की यह पूरी व्यवस्था कहां से शुरू हुई थी, यह समझने के लिए चार्टर एक्ट 1833 और इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 वाले लेख जरूर पढ़ें — केंद्रीकरण से विकेंद्रीकरण तक का पूरा सफर वहीं से समझ आता है।
एक नज़र में तुलना: इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 बनाम 1892
प्रतियोगी परीक्षाओं में इस तुलना पर अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं:
| तुलना का आधार | इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 | इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 |
|---|---|---|
| अतिरिक्त सदस्य (केंद्र) | न्यूनतम 6, अधिकतम 12 | न्यूनतम 10, अधिकतम 16 |
| चुनाव की प्रक्रिया | कोई चुनाव नहीं; सभी सदस्य वायसराय द्वारा मनोनीत | अप्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत; प्रांतीय परिषदों व चेंबर ऑफ कॉमर्स की सिफारिश पर मनोनयन |
| बजट पर अधिकार | बजट पर चर्चा की सख्त मनाही | बजट पर चर्चा का अधिकार मिला, वोटिंग का नहीं |
| प्रश्न पूछने का अधिकार | कार्यपालिका से कोई सवाल नहीं | जनहित के मुद्दों पर सवाल का अधिकार (6 दिन का नोटिस, पूरक प्रश्न नहीं) |
| प्रांतीय प्रतिनिधित्व | केवल गवर्नर का मनोनयन | नगर पालिकाओं, विश्वविद्यालयों, जिला बोर्डों की सिफारिश शुरू |
| कार्यपालिका में बदलाव | 5 सदस्य + पोर्टफोलियो सिस्टम की शुरुआत | कोई ढांचागत बदलाव नहीं; विधि सदस्य को स्थायी सदस्य बनाया गया |

ऐतिहासिक मूल्यांकन और प्रभाव
इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 के प्रभाव का विश्लेषण करें तो कुछ स्पष्ट और दूरगामी परिणाम दिखाई देते हैं।
भारतीयों की सक्रिय भागीदारी: केंद्रीय और प्रांतीय, दोनों विधायिकाओं में पहले के मुकाबले अधिक प्रबुद्ध भारतीय पहुंचने लगे। फिरोजशाह मेहता 1893 में केंद्रीय विधान परिषद पहुंचे, और आगे चलकर गोपाल कृष्ण गोखले 1902 में। इन नेताओं को सरकार के कामकाज को भीतर से देखने और आंकड़ों के आधार पर ब्रिटिश आर्थिक नीतियों को बेनकाब करने का मौका मिला — गोखले के बजट भाषण आगे चलकर राष्ट्रवादी अर्थशास्त्र की मिसाल बने।
प्रतिनिधि सरकार की ओर पहला कदम: ‘चुनाव’ शब्द भले इस्तेमाल न हुआ हो, लेकिन विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड और नगर पालिकाओं द्वारा सदस्यों को भेजने की प्रक्रिया ने भारत में प्रतिनिधि शासन (Representative Government) की ठोस नींव रख दी।
कांग्रेस की विश्वसनीयता में वृद्धि: 1885 में बनी कांग्रेस उस समय महज सात साल पुरानी संस्था थी। अंग्रेजों ने इस एक्ट में उसकी कई मांगों को किसी न किसी रूप में स्वीकार कर लिया, जिससे साबित हो गया कि कांग्रेस एक प्रभावी राष्ट्रीय मंच है। इस पहली राजनीतिक जीत ने जनता की नजरों में उसकी साख बहुत बढ़ा दी।
एक आंकड़ा जो पूरी सच्चाई बता देता है
इतने सुधारों के बाद भी हकीकत यह थी कि व्यवहार में 1892 की केंद्रीय विधान परिषद में कुल 24 सदस्य होते थे, जिनमें भारतीय केवल 5। यानी करोड़ों की आबादी वाले देश की विधायिका में भारतीयों की हिस्सेदारी अब भी पांचवें हिस्से से कम थी — और वे भी न बजट पर वोट डाल सकते थे, न पूरक सवाल पूछ सकते थे।

निष्कर्ष: आगे का रास्ता
इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक बिल्कुल नहीं था। बजट पर वोटिंग का न होना, सुरक्षित रखा गया आधिकारिक बहुमत, और पूरक प्रश्नों पर रोक — ये पाबंदियां भारतीयों को लगातार चुभती रहीं। इसीलिए भारतीय परिषद अधिनियम 1892 को अक्सर ‘अधूरा सुधार’ कहा जाता है।
लेकिन 1861 के ‘बिना दांत के शेर’ वाले एक्ट की तुलना में यह भारत के संवैधानिक विकास में एक सधा हुआ और सकारात्मक कदम था। पहली बार भारतीयों को एक ऐसा संसदीय मंच मिला जहां से वे ब्रिटिश राज से सवाल पूछ सकते थे। यही वजह है कि Indian Councils Act 1892 को भारत में प्रतिनिधि सरकार की नींव का पहला ठोस पत्थर माना जाता है।
हालांकि कांग्रेस के युवा और गरम दल के नेता (लाल-बाल-पाल) इन छोटे सुधारों से संतुष्ट नहीं थे — वे ‘स्वराज’ चाहते थे। इसी असंतोष, 1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन की आग ने ब्रिटिश सरकार को अगले बड़े सुधार की ओर धकेल दिया, जिसे इतिहास में इंडियन काउंसिल एक्ट 1909 (मार्ले-मिंटो सुधार) के नाम से जाना जाता है। इसकी चर्चा हम अपने अगले लेख में विस्तार से करेंगे।
🔗 संबंधित लेख
ब्रिटिश भारत के पूरे संवैधानिक सफर को क्रमवार समझने के लिए हमारा विस्तृत लेख भारत का संवैधानिक विकास (1600-1947) पढ़ें, जहां रेगुलेटिंग एक्ट 1773 से 1947 तक की पूरी टाइमलाइन एक जगह मिलेगी।
इंडियन काउंसिल एक्ट 1892: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 कब पारित हुआ और इसके पीछे मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: इस अधिनियम को 20 जून 1892 को शाही स्वीकृति मिली और यह 3 फरवरी 1893 से लागू हुआ। इसके पीछे मुख्य कारण 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और उसके द्वारा विधान परिषदों में सुधार, चुनाव प्रणाली और बजट पर चर्चा के लिए बनाया गया राजनीतिक दबाव था।
प्रश्न 2: 1892 के एक्ट के तहत केंद्रीय विधायिका में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या कितनी हो गई?
उत्तर: केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या न्यूनतम 10 और अधिकतम 16 कर दी गई, जो 1861 के एक्ट में 6 से 12 थी। इन 16 में 6 आधिकारिक और 10 गैर-आधिकारिक सदस्य होते थे।
उत्तर: नहीं। इस अधिनियम में ‘चुनाव’ शब्द का प्रयोग एक बार भी नहीं हुआ। इसके बजाय प्रांतीय परिषदों, नगर पालिकाओं, विश्वविद्यालयों और चेंबर ऑफ कॉमर्स की ‘सिफारिश पर मनोनयन’ की प्रक्रिया शुरू की गई, जिसे भारत में अप्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत माना जाता है।
प्रश्न 4: 1892 के एक्ट में बजट को लेकर भारतीयों को क्या अधिकार मिला?
उत्तर: पहली बार विधान परिषद के सदस्यों को वार्षिक बजट पर चर्चा करने का ऐतिहासिक अधिकार मिला। हालांकि उन्हें बजट के प्रावधानों पर मतदान करने का अधिकार नहीं दिया गया, यानी वे आलोचना तो कर सकते थे पर बजट बदल नहीं सकते थे।
प्रश्न 5: क्या 1892 के एक्ट के तहत सदस्य सरकार से प्रश्न पूछ सकते थे?
उत्तर: हां, सदस्य जनहित के मुद्दों पर कार्यपालिका से प्रश्न पूछ सकते थे। लेकिन इसके लिए कम से कम 6 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य था, आंतरिक मामलों पर गवर्नर जनरल की पूर्व अनुमति चाहिए थी, और मिले हुए जवाब पर कोई पूरक प्रश्न नहीं पूछा जा सकता था।
प्रश्न 6: 1892 के एक्ट में गैर-आधिकारिक सदस्यों के बहुमत के बावजूद सरकार का बहुमत कैसे बना रहता था?
उत्तर: क्योंकि 16 अतिरिक्त सदस्यों के अलावा परिषद में 9 पदेन सदस्य भी होते थे — वायसराय, कार्यकारी परिषद के 6 सदस्य, प्रधान सेनापति, और उस प्रांत का प्रमुख जहां बैठक होती थी। इस तरह सरकारी पक्ष में 15 सदस्य हो जाते थे, जबकि गैर-आधिकारिक सदस्य केवल 10 रहते थे।
प्रश्न 7: प्रांतीय विधान परिषदों में किन संस्थाओं को सदस्यों की सिफारिश का अधिकार मिला?
उत्तर: विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड, नगर पालिकाएं, बड़े जमींदार और व्यापारिक संघ (चेंबर ऑफ कॉमर्स) — इन्हें प्रांतीय परिषदों के गैर-आधिकारिक सदस्यों की सिफारिश करने का अधिकार दिया गया।
प्रश्न 8: क्या 1892 के एक्ट ने कार्यकारी परिषद में कोई बदलाव किया?
उत्तर: लगभग नहीं। 1861 और 1874 से चली आ रही 6 सदस्यीय कार्यकारी परिषद और पोर्टफोलियो सिस्टम वैसे ही बने रहे। इस एक्ट का एकमात्र उल्लेखनीय बदलाव यह था कि विधि सदस्य (Law Member) को पहली बार कार्यकारी परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया गया। भारतीयों की कार्यपालिका में अब भी कोई एंट्री नहीं थी।
संदर्भ और स्रोत
इस लेख के तथ्यों को प्रामाणिक बनाने के लिए निम्नलिखित मूल दस्तावेज़ों और मानक पुस्तकों का संदर्भ लिया गया है:
1. मूल अधिनियम दस्तावेज़ (प्राथमिक स्रोत):
- इंडियन काउंसिल एक्ट 1892 (55 & 56 Vict. c. 14): भारत में अप्रत्यक्ष चुनाव और बजटीय चर्चा की शुरुआत करने वाला यह अधिनियम 9 फरवरी 1892 को हाउस ऑफ लॉर्ड्स में लॉर्ड क्रॉस द्वारा पेश किया गया, 20 जून 1892 को इसे शाही स्वीकृति मिली, और 3 फरवरी 1893 से यह लागू हुआ। मूल अंग्रेज़ी पाठ ब्रिटेन की आधिकारिक legislation.gov.uk वेबसाइट पर उपलब्ध है।
2. प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रामाणिक पुस्तकें:
- भारत की राजव्यवस्था — एम. लक्ष्मीकांत: अध्याय 1 (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम)
- आधुनिक भारत का इतिहास — स्पेक्ट्रम: नरमपंथियों की उपलब्धियां और प्रारंभिक राष्ट्रवाद
- NCERT (कक्षा 12) आधुनिक भारतीय इतिहास: औपनिवेशिक विधायी सुधार