भारतीय संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास के सफर में इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 (Indian Councils Act 1861) एक बेहद महत्वपूर्ण और युगांतकारी मील का पत्थर माना जाता है। पिछले लेख में जब हम भारत सरकार अधिनियम 1858 पर चर्चा कर रहे थे, तो हमने देखा था कि किस तरह ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सौ साल से चले आ रहे शासन का अंत कर दिया और भारत की सत्ता सीधे ब्रिटिश ताज ने अपने हाथों में ले ली।
उसी लेख के अंत में हमने यह भी स्पष्ट किया था कि 1858 के अधिनियम ने लंदन में बैठे प्रशासन का ढांचा (भारत सचिव, भारत परिषद) तो पूरी तरह बदल दिया, लेकिन भारत के भीतर कानून बनाने और प्रशासन चलाने की व्यवस्था वैसी ही पुरानी पड़ी रही जैसी 1853 में तय हुई थी। यानी सत्ता का मालिक बदल गया था, पर भारत के भीतर का ढांचा वहीं का वहीं था। इसी ऐतिहासिक शून्य को भरने के लिए ब्रिटिश संसद ने 1 अगस्त 1861 को इंडियन काउंसिल एक्ट पारित किया।
UPSC, UPPSC, BPSC और अन्य राज्य PCS परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह अधिनियम इसलिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक भारत की कई प्रशासनिक व्यवस्थाएं — कैबिनेट प्रणाली, राष्ट्रपति का अध्यादेश जारी करने का अधिकार, और राज्यों की अपनी विधायिकाएं — इसी एक्ट की कोख से जन्मी हैं। आइए, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर इसके मूल्यांकन तक, इस अधिनियम को विस्तार से समझते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह एक्ट क्यों लाया गया?
1857 की क्रांति ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। 1858 के एक्ट के जरिए ब्रिटेन ने सत्ता अपने हाथ में तो ले ली, लेकिन लंदन के राजनेताओं को यह कड़वी सच्चाई अच्छी तरह समझ आ चुकी थी कि भारत जैसे विशाल और विविधताओं भरे देश पर बिना भारतीयों के सहयोग के लंबे समय तक शासन करना नितांत असंभव है।
इस एक्ट के पीछे मुख्यतः दो कारण काम कर रहे थे।
1. सहयोग की नीति
1857 के विद्रोह का एक बड़ा कारण यह था कि शासकों और शासितों के बीच संवाद का कोई पुल ही नहीं था। सर सैयद अहमद खान ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द’ (The Causes of the Indian Revolt) में साफ शब्दों में लिखा था कि विधान परिषदों में भारतीयों का न होना विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक था। भारतीय जनता क्या सोचती है, उसकी तकलीफें क्या हैं — यह जानने का कोई मंच ही ब्रिटिश सरकार के पास नहीं था। इसलिए तय हुआ कि भारत के लिए कानून बनाते समय भारतीयों को भी उसमें शामिल किया जाए, भले ही नाममात्र के लिए।
2. अति-केंद्रीकरण की विफलता
याद कीजिए चार्टर एक्ट 1833, जिसने कानून बनाने की पूरी शक्ति एक ही जगह — गवर्नर जनरल — पर केंद्रित कर दी थी और मद्रास व बॉम्बे से यह अधिकार पूरी तरह छीन लिया था। नतीजा यह हुआ कि कलकत्ता में बैठी एक छोटी-सी परिषद पूरे भारत की स्थानीय समस्याओं को समझने और उनके लिए उपयुक्त कानून बनाने में बुरी तरह विफल साबित हो रही थी। मद्रास सरकार और वहां के सर्वोच्च न्यायालय के बीच के टकराव ने इस विफलता को और उजागर कर दिया था।
इन्हीं खामियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने एक के बाद एक तीन ‘इंडियन काउंसिल एक्ट’ पारित किए — 1861, 1892 और 1909। वर्ष 1861 का अधिनियम इसी सुधार श्रृंखला की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी था।
ध्यान देने वाली बात
1861 का साल भारतीय प्रशासन के लिए तिहरा मोड़ था। इसी एक साल में ब्रिटिश संसद ने तीन अलग-अलग कानून पास किए — इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 (विधायिका और कार्यपालिका के लिए), इंडियन हाई कोर्ट्स एक्ट 1861 (कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में उच्च न्यायालयों की स्थापना के लिए) और इंडियन सिविल सर्विस एक्ट 1861 (नौकरशाही के लिए)। यानी 1857 के बाद अंग्रेजों ने शासन के तीनों अंगों को एक साथ नए सिरे से गढ़ा।

इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 के प्रमुख प्रावधान
इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 ने भारत के प्रशासनिक और विधायी ढांचे में कई अहम बदलाव किए, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि लंदन में बैठी नियंत्रण व्यवस्था इससे लगभग अछूती रही। नीचे सभी प्रमुख प्रावधानों को क्रमवार समझते हैं।
भारत सरकार पर नियंत्रण: लंदन का यथास्थितिवादी रवैया
अगर नियंत्रण (Control) की बात करें, तो इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 ने इस मोर्चे पर कुछ भी नहीं बदला। लंदन ने अपनी पकड़ रत्ती भर भी ढीली नहीं की।
1858 के एक्ट से स्थापित ढांचा जस का तस बना रहा — भारतीय प्रशासन की अंतिम जवाबदेही अब भी लंदन में बैठे भारत सचिव (Secretary of State for India) के पास ही थी, उसकी सहायता के लिए बनी 15 सदस्यीय भारत परिषद पहले की तरह काम करती रही, और भारत में वायसराय भारत सचिव के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाता रहा।
एक वाक्य में कहें तो — 1861 का एक्ट भारत के भीतर का कानून था, लंदन को उसने छुआ तक नहीं।
कार्यकारी परिषद (Executive Council) का विस्तार
चार्टर एक्ट 1853 के तहत गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में 4 सदस्य होते थे। 1861 के एक्ट ने इसमें एक पांचवां सदस्य जोड़कर संख्या 5 कर दी।
इन पांच सदस्यों की नियुक्ति का गणित एक्ट में बहुत बारीकी से तय किया गया था:
- 3 सदस्य भारत सचिव द्वारा नियुक्त होते थे, और शर्त यह थी कि ये ऐसे व्यक्ति हों जो नियुक्ति के समय भारत में क्राउन (या कंपनी और क्राउन) की सेवा में कम से कम 10 वर्ष बिता चुके हों।
- 2 सदस्य सीधे महारानी द्वारा नियुक्त होते थे, और इनमें से एक का बैरिस्टर होना अनिवार्य था — वह भी कम से कम 5 वर्ष के अनुभव वाला। यही ‘विधि सदस्य’ (Law Member) कहलाता था।
- इसके अलावा भारत के प्रधान सेनापति को इस परिषद का ‘असाधारण सदस्य’ (Extraordinary Member) बनाया गया, जिसे परिषद में गवर्नर जनरल के ठीक बाद की वरीयता प्राप्त थी।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट
आगे चलकर वर्ष 1874 में इसी कार्यकारी परिषद में एक छठा सदस्य जोड़ा गया, जिसे लोक निर्माण विभाग (PWD) का प्रभार सौंपा गया। यह वही PWD है जो आज भी केंद्र और राज्य सरकारों में मौजूद है। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है — “1861 के एक्ट के बाद कार्यकारी परिषद में कितने सदस्य थे?” उत्तर है 5, और छठा सदस्य 1874 में जुड़ा, इस एक्ट से नहीं।
पोर्टफोलियो सिस्टम की वैधानिक मान्यता

यह इस एक्ट की सबसे बड़ी और सबसे स्थायी देन थी।
1861 से पहले कार्यकारी परिषद एक संयुक्त सलाहकार समिति की तरह काम करती थी — सारे सदस्य मिलकर हर छोटे-बड़े मुद्दे पर चर्चा करते, और किसी सदस्य की किसी खास विभाग के प्रति कोई व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं होती थी। इससे फैसलों में भारी लेटलतीफी होती थी।
तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने 1859 में अपने स्तर पर एक नई व्यवस्था शुरू की थी, जिसे 1861 के एक्ट ने अब कानूनी मान्यता दे दी। इसे ‘पोर्टफोलियो सिस्टम’ कहा गया। इसका सीधा अर्थ था — परिषद के हर सदस्य को सरकार का एक अलग विभाग सौंप दिया गया, और वह अपने विभाग के मामलों में परिषद की ओर से अंतिम आदेश जारी कर सकता था।
उस समय 5 सदस्यों को जो 5 विभाग सौंपे गए, वे थे:
- गृह (Home)
- सैन्य (Military)
- कानून (Law)
- राजस्व (Revenue)
- वित्त (Finance)
आज के संदर्भ में देखें तो यह बिल्कुल हमारी कैबिनेट मंत्री प्रणाली जैसी व्यवस्था थी, जहां हर मंत्री के पास अपना मंत्रालय होता है और वह अपने विभाग के फैसलों के लिए जिम्मेदार होता है। आधुनिक भारत की कैबिनेट प्रणाली की नींव यहीं से पड़ी।
अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की असाधारण शक्ति
भारत जैसे अशांत देश में अंग्रेजी राज को सुरक्षित रखने के लिए इस एक्ट ने वायसराय को एक विशेष शक्ति दी।
प्रावधान यह था कि यदि देश में कोई आपातकालीन स्थिति आ जाए और विधान परिषद का सत्र न चल रहा हो, तो वायसराय बिना किसी चर्चा या मंजूरी के सीधे अध्यादेश जारी कर सकता था। ये अध्यादेश सामान्य कानून की तरह ही प्रभावी होते थे, लेकिन इनकी वैधता अधिकतम 6 महीने की होती थी।
आज से जोड़कर देखिए
यही आपातकालीन शक्ति आज भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपालों को प्राप्त है। जो व्यवस्था 1861 में एक ब्रिटिश वायसराय के लिए गढ़ी गई थी, वही आज हमारे लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा है।
गवर्नर जनरल की ‘ओवररूल’ शक्ति
एक्ट ने गवर्नर जनरल को यह अधिकार भी दिया कि भारत में ब्रिटिश हितों और सुरक्षा से जुड़े मामलों में वह अपनी ही परिषद के बहुमत के फैसले को पलट सकता था। साथ ही उसे परिषद के कामकाज के नियम बनाने और अपनी अनुपस्थिति में बैठक की अध्यक्षता के लिए किसी सदस्य को नियुक्त करने का अधिकार भी मिला।
केंद्रीय विधायिका: कानून बनाने में भारतीयों की नाममात्र एंट्री

कानून बनाने की प्रक्रिया में इस एक्ट ने बड़े फेरबदल किए। 1853 में बनी उस 12 सदस्यीय परिषद का स्वरूप, जिसे इतिहासकार ‘मिनी पार्लियामेंट’ कहते थे, पूरी तरह बदल दिया गया।
‘अतिरिक्त सदस्यों’ (Additional Members) की नई व्यवस्था
1853 वाले 6 स्थायी लेजिस्लेटिव काउंसिलर्स की अवधारणा खत्म कर दी गई। उसकी जगह वायसराय को यह अधिकार मिला कि वह अपनी कार्यकारी परिषद के अलावा, सिर्फ कानून बनाने के उद्देश्य से कुछ ‘अतिरिक्त सदस्य’ मनोनीत कर सके। इनकी संख्या न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 तय की गई, और इनका कार्यकाल 2 वर्ष रखा गया।
इन अतिरिक्त सदस्यों को दो श्रेणियों में बांटा गया:
- आधिकारिक सदस्य: जो ब्रिटिश सरकार की सिविल या सैन्य सेवा में कार्यरत थे। ये पूरी तरह सरकार के आदमी थे और सरकार के पक्ष में ही वोट करते थे।
- गैर-आधिकारिक सदस्य: जो सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं थे।
एक्ट में अनिवार्य किया गया कि कुल अतिरिक्त सदस्यों में से कम से कम आधे गैर-आधिकारिक होने चाहिए। लेकिन कूटनीति देखिए — कार्यकारी परिषद और आधिकारिक अतिरिक्त सदस्यों को मिलाकर विधान परिषद में बहुमत हमेशा ब्रिटिश अधिकारियों का ही बना रहता था।
तीन भारतीयों का ऐतिहासिक मनोनयन (1862)
इसी ‘गैर-आधिकारिक’ श्रेणी के रास्ते से भारत के इतिहास में पहली बार कानून बनाने वाली संस्था में भारतीयों को प्रवेश मिला। 1862 में वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने अपनी नवगठित विधान परिषद में तीन भारतीयों को गैर-आधिकारिक सदस्य के रूप में मनोनीत किया:
- बनारस के राजा
- पटियाला के महाराजा
- सर दिनकर राव
एक कड़वी सच्चाई (विश्लेषण)
कहने को यह बड़ा ‘अहसान’ था कि भारतीय कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा बन गए। हकीकत यह थी कि करोड़ों की आबादी के लिए बंद कमरों में मुश्किल से 15-16 लोग कानून बना रहे थे। और सबसे अहम बात — जो तीन भारतीय चुने गए, वे जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं थे। उन्हें वोट से नहीं, वायसराय की मर्जी से ‘मनोनीत’ किया गया था। तीनों बेहद अमीर, जमींदार और अंग्रेजों के वफादार थे — आम भारतीय की गरीबी और समस्याओं से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
विधायिका की शक्तियां: एक ‘बिना दांत का शेर’
नई विधान परिषद तो बन गई, लेकिन उसके पास शक्तियां न के बराबर थीं। एक्ट ने साफ कर दिया था कि इस परिषद का काम केवल कानून बनाना है — प्रशासन या वित्त पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा:
- वित्तीय मामलों पर पूर्ण पाबंदी: परिषद में बजट, कर या वित्तीय मामलों पर किसी भी तरह की चर्चा की सख्त मनाही थी।
- प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं: अतिरिक्त सदस्य कार्यकारी सदस्यों से कोई सवाल नहीं पूछ सकते थे। गृह या रक्षा विभाग क्या कर रहा है, इस पर कोई भारतीय सदस्य जवाब नहीं मांग सकता था।
- प्रस्ताव लाने का अधिकार नहीं: सदस्य कोई प्रस्ताव (Resolution) भी पेश नहीं कर सकते थे।
यानी यह परिषद वायसराय की मर्जी के बिलों पर मुहर लगाने वाली एक ‘रबर स्टाम्प’ संस्था बनकर रह गई।
प्रांतीय विधायिका: विकेंद्रीकरण (Decentralization) की शुरुआत
यह इस एक्ट का सबसे दूरगामी ढांचागत कदम था, जिसने भारत में संघीय व्यवस्था के बीज बोए।
1857 के बाद अंग्रेजों को यह समझ आ गया था कि भारत जैसे विशाल देश को अकेले कलकत्ता से नहीं चलाया जा सकता। स्थानीय भौगोलिक और सांस्कृतिक समस्याओं के लिए स्थानीय कानून चाहिए। इसलिए 1861 के एक्ट ने 1833 की उस केंद्रीकरण वाली गलती को सुधारा और विकेंद्रीकरण की विधिवत शुरुआत की।
बॉम्बे और मद्रास की वापसी: इन दोनों प्रेसीडेंसियों को उनकी विधायी शक्तियां ससम्मान वापस लौटा दी गईं। साथ ही उनके गवर्नरों को अपनी परिषद में 4 से 8 अतिरिक्त सदस्य और एडवोकेट-जनरल मनोनीत करने का अधिकार भी मिला — कार्यकाल यहां भी 2 वर्ष का था। हालांकि पेच यह था कि इन प्रांतीय परिषदों द्वारा पारित हर कानून पर गवर्नर और गवर्नर जनरल, दोनों की सहमति अनिवार्य थी।
नई प्रांतीय विधान परिषदों का गठन: एक्ट में यह प्रावधान भी किया गया कि भारत के अन्य बड़े क्षेत्रों में नई प्रांतीय विधान परिषदें बनाई जा सकेंगी। इसी शक्ति का उपयोग करते हुए आगे चलकर तीन नई परिषदें अस्तित्व में आईं:
| प्रांत | विधान परिषद की स्थापना |
|---|---|
| बंगाल (Bengal) | 1862 |
| उत्तर-पश्चिमी प्रांत (North-Western Provinces; कई पुस्तकों में NWFP) | 1866 |
| पंजाब (Punjab) | 1897 |
इन प्रांतीय परिषदों का ढांचा भी केंद्रीय परिषद जैसा ही था — गवर्नर के अधीन आधिकारिक और गैर-आधिकारिक ‘अतिरिक्त सदस्य’।
वायसराय और भारत सचिव का दबदबा: पूर्व अनुमति और वीटो

कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू तो हो गई, लेकिन लगाम पूरी तरह अंग्रेजों के हाथ में ही रही। इसके लिए दो कड़े प्रावधान रखे गए।
वायसराय की पूर्व अनुमति
यदि कोई विधेयक निम्नलिखित चार संवेदनशील विषयों से जुड़ा हो, तो उसे परिषद में पेश करने से पहले ही वायसराय की मंजूरी लेना अनिवार्य था:
- सार्वजनिक ऋण और राजस्व
- धर्म और धार्मिक रीति-रिवाज
- सेना और नौसेना का अनुशासन
- विदेशी संबंध
इन विषयों पर वायसराय की अनुमति के बिना परिषद में एक शब्द भी नहीं बोला जा सकता था।
क्राउन की सर्वोच्च वीटो शक्ति
मान लीजिए कोई विधेयक परिषद में पास हो गया और वायसराय ने भी उस पर अपनी स्वीकृति दे दी — वह अब कानून बन चुका है। इसके बावजूद महारानी (क्राउन) के पास यह सर्वोच्च अधिकार सुरक्षित था कि वह भारत सचिव के माध्यम से उस कानून को कभी भी रद्द कर सकती थी। व्यवहार में यह शक्ति भारत सचिव ही इस्तेमाल करता था।
यानी भारत में बना कोई भी कानून तब तक सुरक्षित नहीं था, जब तक लंदन उससे खुश था।
एक नज़र में तुलना: चार्टर एक्ट 1833 बनाम इंडियन काउंसिल एक्ट 1861
प्रतियोगी परीक्षाओं में केंद्रीकरण से विकेंद्रीकरण तक के इस सफर पर प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं:
| तुलना का आधार | चार्टर एक्ट 1833 (केंद्रीकरण का चरम) | इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 (विकेंद्रीकरण की शुरुआत) |
|---|---|---|
| विधायी शक्तियां | बॉम्बे और मद्रास से कानून बनाने का अधिकार छीन लिया गया | बॉम्बे और मद्रास को विधायी शक्तियां वापस लौटाई गईं |
| प्रशासनिक स्वरूप | पूरे भारत के लिए केवल एक केंद्रीय परिषद (कलकत्ता) | बंगाल (1862), उत्तर-पश्चिमी प्रांत (1866) और पंजाब (1897) में नई प्रांतीय परिषदें |
| भारतीयों की भागीदारी | कानून बनाने में कोई भागीदारी नहीं | गैर-आधिकारिक सदस्य के रूप में पहली बार 3 भारतीय शामिल |
| कार्यपालिका का स्वरूप | सभी सदस्य मिलकर सामूहिक सलाहकार के रूप में काम करते थे | पोर्टफोलियो सिस्टम — हर सदस्य को अलग विभाग |
| कार्यकारी परिषद के सदस्य | 4 (1833 में विधि सदस्य जोड़ा गया) | 5 (पांचवां सदस्य — बैरिस्टर/विधि सदस्य) |
| आपातकालीन शक्ति | कोई प्रावधान नहीं | वायसराय को 6 माह तक प्रभावी अध्यादेश जारी करने की शक्ति |

ऐतिहासिक मूल्यांकन और निष्कर्ष
इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 का समग्र मूल्यांकन करें तो यह एक्ट दोधारी तलवार जैसा प्रतीत होता है।
एक तरफ, इसने भारत के वर्तमान प्रशासनिक ढांचे की मजबूत नींव रखी। आज हमारे पास जो कैबिनेट प्रणाली (पोर्टफोलियो सिस्टम) है, राष्ट्रपति का अध्यादेश जारी करने का अधिकार है, और केंद्र-राज्य के बीच शक्तियों का जो बंटवारा है — इन सबकी शुरुआत इसी एक्ट से हुई। साथ ही इसी एक्ट ने पहली बार सिद्धांत रूप में यह स्वीकार किया कि भारत के लिए कानून बनाते समय भारतीयों को भी जोड़ा जाना चाहिए, जिसने ‘प्रतिनिधि संस्थाओं’ (Representative Institutions) के छोटे ही सही, पर बीज अवश्य बो दिए।
लेकिन दूसरी तरफ, यह लोकतंत्र का एक बेहद पतला और झूठा मुखौटा था। जो विधान परिषदें बनीं, वे पूरी तरह शक्तिहीन थीं — न बजट पर बोल सकती थीं, न सरकार से सवाल पूछ सकती थीं। जिन भारतीयों को शामिल किया गया, वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अंग्रेजों के वफादार जमींदार और राजा थे। सारी असली शक्तियां — वीटो, पूर्व अनुमति और अध्यादेश — वायसराय और भारत सचिव की मुट्ठी में कैद थीं।
संक्षेप में कहें तो, इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 ने भारत में एक तानाशाही शासन के ऊपर एक पतला ‘विधायी’ आवरण चढ़ाने का काम किया। भारतीयों को यह समझ आ गया था कि उन्हें परिषद में बैठने की जगह तो मिल गई है, लेकिन बोलने का अधिकार नहीं मिला।
आने वाले वर्षों में जब भारत में राष्ट्रवाद का उदय हुआ और 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, तो भारतीयों ने परिषदों में सुधार, बजट पर बहस के अधिकार और निर्वाचन प्रक्रिया की पुरजोर मांग उठाई। इन्हीं बढ़ती मांगों का परिणाम था हमारा अगला अधिनियम — इंडियन काउंसिल एक्ट 1892, जहां पहली बार ‘अप्रत्यक्ष चुनाव’ का खेल शुरू हुआ। इस पर हम अपने अगले लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे।
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इंडियन काउंसिल एक्ट 1861: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 कब पारित हुआ और इसे क्यों लाया गया?
उत्तर: इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 को 1 अगस्त 1861 को ब्रिटिश संसद की स्वीकृति मिली। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को यह समझ आ गया था कि भारतीयों के सहयोग के बिना शासन चलाना असंभव है, और 1833 के अत्यधिक केंद्रीकरण से प्रशासन ठप पड़ रहा था। इन्हीं दोनों समस्याओं को दूर करने के लिए यह एक्ट लाया गया।
प्रश्न 2: पोर्टफोलियो सिस्टम क्या है और इसे किसने शुरू किया?
उत्तर: पोर्टफोलियो सिस्टम वह व्यवस्था है जिसमें कार्यकारी परिषद के हर सदस्य को एक अलग विभाग सौंपा जाता है और वह उस विभाग के मामलों में अंतिम आदेश जारी कर सकता है। इसे वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने 1859 में शुरू किया था, और इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 ने इसे कानूनी मान्यता दी। यही आज की कैबिनेट मंत्री प्रणाली की जड़ है।
प्रश्न 3: 1861 के एक्ट के तहत विधान परिषद में मनोनीत होने वाले पहले तीन भारतीय कौन थे?
उत्तर: वर्ष 1862 में वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों को गैर-आधिकारिक सदस्य के रूप में मनोनीत किया — बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव। ये तीनों निर्वाचित नहीं, बल्कि मनोनीत सदस्य थे।
प्रश्न 4: इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 को विकेंद्रीकरण की शुरुआत क्यों माना जाता है?
उत्तर: क्योंकि इसने बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसियों को उनकी विधायी शक्तियां वापस लौटा दीं, जो चार्टर एक्ट 1833 ने छीन ली थीं। साथ ही इसने बंगाल (1862), उत्तर-पश्चिमी प्रांत (1866) और पंजाब (1897) में नई प्रांतीय विधान परिषदों का रास्ता खोला।
प्रश्न 5: 1861 के एक्ट के तहत वायसराय की कार्यकारी परिषद में कितने सदस्य थे?
उत्तर: इस एक्ट ने कार्यकारी परिषद के सदस्यों की संख्या 4 से बढ़ाकर 5 कर दी। इनमें से 3 की नियुक्ति भारत सचिव करता था (शर्त: भारत में कम से कम 10 वर्ष की सेवा), और 2 की नियुक्ति महारानी करती थी, जिनमें से एक का बैरिस्टर होना अनिवार्य था। प्रधान सेनापति को असाधारण सदस्य का दर्जा दिया गया था। छठा सदस्य (PWD) 1874 में जोड़ा गया।
प्रश्न 6: 1861 के एक्ट में अध्यादेश (Ordinance) का क्या प्रावधान था?
उत्तर: आपातकालीन स्थिति में, जब विधान परिषद का सत्र न चल रहा हो, वायसराय बिना परिषद की मंजूरी के अध्यादेश जारी कर सकता था, जिसकी वैधता अधिकतम 6 महीने होती थी। यही शक्ति आज भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 (राष्ट्रपति) और अनुच्छेद 213 (राज्यपाल) में मौजूद है।
प्रश्न 7: किन विषयों पर विधेयक लाने से पहले वायसराय की पूर्व अनुमति अनिवार्य थी?
उत्तर: चार विषयों पर — सार्वजनिक ऋण व राजस्व, धर्म और धार्मिक रीति-रिवाज, सेना व नौसेना का अनुशासन, तथा विदेशी संबंध। इनके अलावा, परिषद द्वारा पारित किसी भी कानून को क्राउन भारत सचिव के माध्यम से रद्द कर सकता था।
प्रश्न 8: 1861 के एक्ट द्वारा बनाई गई विधान परिषद को ‘रबर स्टाम्प’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि इस परिषद के पास वास्तविक शक्ति नहीं थी। इसके सदस्य न तो बजट या वित्तीय मामलों पर चर्चा कर सकते थे, न कार्यपालिका से सवाल पूछ सकते थे, और न ही कोई प्रस्ताव पेश कर सकते थे। उनका काम केवल वायसराय के लाए विधेयकों पर विचार करना था।
संदर्भ और स्रोत
इस लेख के तथ्यों को प्रामाणिक बनाने के लिए निम्नलिखित मूल दस्तावेज़ों और मानक पुस्तकों का संदर्भ लिया गया है:1. मूल अधिनियम दस्तावेज़ (प्राथमिक स्रोत):- इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 (24 & 25 Vict. c. 67): इस अधिनियम को 1 अगस्त 1861 को शाही स्वीकृति मिली थी। इसकी धारा 3 में कार्यकारी परिषद के पांच सदस्यों की नियुक्ति और योग्यता संबंधी शर्तें, तथा धारा 10 में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या का उल्लेख है।
- भारत की राजव्यवस्था — एम. लक्ष्मीकांत: अध्याय 1 (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — ताज का शासन)
- आधुनिक भारत का इतिहास — स्पेक्ट्रम: 1857 के बाद के संवैधानिक सुधार
- NCERT (कक्षा 12) आधुनिक भारतीय इतिहास: औपनिवेशिक प्रशासनिक संरचना